वास्तव में, कानून के समक्ष सब बराबर ?

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Thus Teesta Setalwad enjoys the paramount liberty. Pic Courtesy: Mail Today via huffingtonpost

“पर्सनल लिबर्टी इज पैरामाउंट एंड कैन नॉट बी बार्टरेड फॉर ऑल द स्टार्स इन द स्काई” के मद्देनजर एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड के लिए सुप्रीम कोर्ट से आयी राहत ने एक बार फिर “एक न्यायिक सिद्धांत और पैमाने दो” की चर्चा जोरों से छेड़ दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने तीस्ता सीतलवाड और जावेद आनंद इस विवादित एक्टिविस्ट दंपत्ति पर गबन के आरोपों के चलते गुजरात पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी रोकने के लिए अर्जी पर सुनवाई करते हुए गिरफ्तार न करने की अवधि बढ़ाते हुए एक चौंकाने वाला निर्देश देकर फैसला सुरक्षित रखा है. लेकिन माननीय कोर्ट द्वारा हाल ही दिनों में एक जैसे समकक्ष मामलों में दिए हुए अलग-अलग निर्णयों ने कहीं न कहीं लोकतंत्र के न्याय पालिका के इस स्तम्भ में अटूट आस्था रखने वालों के मन में भेदभाव होने के विचार को जन्म दिया है. जहाँ एक ओर संत श्री आसाराम बापू और सहारा प्रमुख सुब्रत राय के निर्णय जनमानस में गढ़ी गयी विकृत छवि और उनके लिए उठे विरोध के अनुरूप हुए हैं, वहीं दूसरी ओर तीस्ता सीतलवाड, बिनायक सेन, सोनी सोरी, तरुण तेजपाल के निर्णय उनके पीछे डटी हुई एक्टिविस्ट-वकीलों और उनके लिए सहानभूति रखने वाली जमात द्वारा ‘राजनैतिक बदले की भावना से करवाई करने’ और ‘संवैधानिक अधिकारों की दुहाई देने’ के शोर को तेज करने के फलस्वरूप हुई प्रतिकिया के अनुरूप हुए हैं. सोनी सोरी के मामले में कोर्ट द्वारा एक रक्षक की भूमिका अपनायी गयी. नक्सलवादियों को मदद करने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास भुगत रहे बिनायक सेन पर राजद्रोह के आरोपों को ख़ारिज कर जमानत दिए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणी कि हम एक लोकतान्त्रिक देश में रहे हैं और महज किसी को नक्सलवादियों के प्रति सहानभूति रखने को राजद्रोह का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, इसी श्रृंखला में एक विशेष दृष्टान्त है. तरुण तेजपाल को बलात्कार के संगीन आरोपों के होते हुए भी पहले माँ के अंतिम संस्कार के लिए अंतरिम जमानत मिलना, फिर उसके आगे बढ़ाये जाना और अंत में कोर्ट के समक्ष पासपोर्ट सरेंडर करने की शर्त पर बड़े नाटकीय तरीके जमानत मिल जाती है. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को केवल तीन पंक्तियों के ऑर्डर में जमानत मिला जाना और निर्णय पर रोक लगाना, ज्यादा पुराने उदाहरण नहीं हैं.

जनहित की इस प्रक्रिया में परिवादी की परिभाषा के विस्तार के चलते सोशल एक्टिविस्ट वकीलों, ह्यूमनराइट्स एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों के मिलेजुले सर्कल वाले एक इको-सिस्टम का निर्माण परिणामस्वरूप देखा जा सकता है जो हमेशा सरकारी तंत्र पर न्यायपालिका के जरिये दबाब बनाने की फिराक में रहता है.

पिछले साल भी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की आपराधिकता बरकरार रखने के बाद इनके पैरोकार करने वाले संगठनों द्वारा विरोध के तीव्र स्वरों के बीच कोर्ट के उदारवादी उद्गार कि चाहे तो सरकार इस धारा के उन्मूलन के लिए बिल संसद में ला सकती है, न्यायपालिका की इस बदलती भूमिका को ही प्रकट करते हैं. ऐसे में तीस्ता सीतलवाड के लिए आयी राहत से इस मुद्दे को फिर से प्रकाश में ला खड़ा कर दिया है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह जो पिछले सात वर्षों से बिना चार्जशीट दाखिल किये ही कारावास में हैं और संत श्री आसाराम बापू जिनको ख़राब स्वास्थ्य के आधार पर जमानत देने के लिए उनकी बीमारी के होने या नहीं होने को एक नहीं दो–दो बार मेडिकल बोर्ड गठित कर जांचने के बाद एक लंबे –चौड़े निर्णय में न्यायसंगत दलीलों से आरोपों की गंभीरता दिखाते हुए जमानत देने से इंकार कर दिया, कानून के समक्ष कहीं न कहीं औरों से अलग हैं. इसीलिए पिछले कुछ अरसे हो रहे एक के बाद एक असाधारण निर्णयों ने न्यायपालिका के इस ‘ज्युडिशियल एक्टिविज्म’ की तरफ ढलते स्वरुप ने एक तरह से इसकी साख को सवालों के घेरे में ला खड़ा कर दिया है. भारतीय न्यायपालिका के इन्हीं निर्णय देने के तौर-तरीकों को कुरेदती और सामान सिद्धांत वालों मुकदमों के निर्णयों में अंतर को टटोलती पूर्व केंद्रीय मंत्री और अर्थशास्त्री अरुण शौरी की किताब “कोर्ट्स एंड इट्स जजमेंट्स” में न्यायपालिका के इस स्याह पक्ष को बड़ी साफगोई से विश्लेषित किया है – “न्यायालय भारतीय संविधान में परिभाषित अनुच्छेदों का अर्थ अपनी सहूलियत के हिसाब से न्याय देने में प्रयोग करते आये हैं. किताब के अनुसार न्यायालयों द्वारा संविधान में निहित शक्तियों के प्रयोग भी असंगत तौर पर होते रहे हैं. विशेषकर अनुच्छेद 12, 14 और 21 ‘राज्य की परिभाषा’ , ‘कानून की समानता का अधिकार’ और ‘जीवन और स्वतंत्रता की समानता के अधिकार’ के अर्थ विस्तार को लेकर. पिछले दशकों में न्यायपालिका द्वारा चुने हुए केसों में दिए गए जटिल और समझने में कठिन निर्णयों का जिक्र उन्होंने किया है.” खैर, न्यायपालिका को ‘जुडिशियल एक्टिविज्म’ की भूमिका की तरफ मोड़ देने की शुरुआत सन 1979 में हुई जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनहित याचिका को संज्ञान के दायरे में लिया जाने लगा और न्यायपालिका ने अपने ज्यूरीडिक्शन को बढ़ाते हुए परिवादी की परिभाषा का विस्तार किया जिसके तहत सामाजिक कार्यकर्त्ता और विषय से जुड़े हुए वकीलों की याचिकाएं सुने जाने का अधिकार मिल गया. गौरतलब है कि न्यायपालिका का यह कदम बेशक सामाजिक न्याय से वंचित जनसामान्य के उन पिछड़े गरीब तबकों के लिये न्याय सुलभ कराने के उद्देश्य से लिया गया था. लेकिन समय के साथ संविधान के अनुच्छेद 32 में निहित शक्तियों के अन्दर सुप्रीम कोर्ट जनहित के लिए ये ‘स्पेशल इंटरवेंशंस’ अपने मूल उद्देश्य से भटक गयीं है और न्यायपालिका कहीं न कहीं अपनी सीमाओं को लांघते हुए सरकारों के कामकाज, नीतियों का आंकलन व उनके सुधार और सरकारी विभागों के पर्यवेक्षण की भूमिका में ज्यादा आ गयी है. ‘इंडियन कोर्ट्स टर्न्स एक्टिविक्ट्स’ की इस भूमिका से पूर्व मुख्य न्यायधीश केजी बालाकृष्णन समेत कई न्यायविद भी सहमत होते रहे हैं. न्यायपालिका के ये ‘हस्तक्षेप’ से भले ही सामाजिक न्याय के क्षेत्र में और सरकारी नीतिगत विषयों में अभूतपूर्व निर्णय आये हों लेकिन जनहित की इस प्रक्रिया में परिवादी की परिभाषा के विस्तार के चलते सोशल एक्टिविस्ट वकीलों, ह्यूमनराइट्स एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों के मिलेजुले सर्कल वाले एक इको-सिस्टम का निर्माण परिणामस्वरूप देखा जा सकता है जो हमेशा सरकारी तंत्र पर न्यायपालिका के जरिये दबाब बनाने की फिराक में रहता है. ऐसा सर्कल जो बिनायक सेन, तीस्ता सीतलवाड और तरुण तेजपाल के लिए कानूनी अधिकार दिलाने के लिए तो एड़ी से चोटी तक का जोर लगा देता है और संत आसारामजी बापू के लिए प्राथमिकी के पहले दिन से ही फांसी पर चढ़ा देने की मांग करता है. ऐसे में तीस्ता सीतलवाड की पैरवी में डट जाने वाली पूर्व सोलिसिटर जनरल इंद्रा जयसिंह और एक्टिविस्ट वकील कामिनी जायसवाल का कहना कि रेप और मर्डर के आरोपियों को तो जमानत मिल जाती है तो तीस्ता पर आरोप महज गबन का है, वहीं दूसरी तरफ संत आसारामजी बापू के केस में लड़की की तरफ से पैरवी करने वाली यही कामिनी जायसवाल सुप्रीम कोर्ट में आरोपों की गंभीरता की दुहाई देकर पुरजोर विरोध करती रही हैं. गुजरात सरकार को बेबस कर तीस्ता सीतलवाड को मिली इस राहत से यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली इस सरकार जो फिलहाल केवल ‘पी आर’ (पब्लिक रिलेशन) के लिए केन्द्रित दिखाई देती है और शायद इसको भी नजरंदाज कर जाती है कि उसी के द्वारा नियुक्त किये जाने वाली ‘प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया’ के तमाम अधिकारीगण तीस्ता सीतलवाड के ऊपर ज्यादती बताकर समर्थन पारित कर देते हैं, तो ऐसे में सोशल एक्टिविस्ट-वकीलों का यह सर्कल सरकार के लिए खासा सरदर्द पैदा करने वाला है. इसलिए तीस्ता सीतलवाड जैसे निर्णयों का घटित होना जुडिशियल एक्टिविज्म के अन्दर न्यायपालिका पर पैदा की जाने वाली बाध्यता ही कहा जा सकता है.

Nishant Sharma
Writer-Activist, Crusader for Media Regulation, Anti-Corruption.
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