पत्रकारिता का अविश्वसनीय होता चरित्र - स्वामी विवेकानन्द

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Vivekananda, who faced a malign propaganda to vilifying him by US newspapers. Courtesy : Vivekanandar illam

पत्रकारिता का हालिया स्तर इस प्रकार मैला हो चुका है कि इस दुर्गन्ध-सरोवर की थाह ही नजर नहीं आती है.

लोकतंत्र का चौथा खम्भा, सामाजिक सरोकारी की मिसाल और जूनून के रक्त से लथपथ अपने आपको बताना, व्यवसाय नहीं सत्य-साधना आदि आदि के इन कहकहों के बीच अभिव्यक्ति की खुली आजादी के आवरण के अन्दर अपने धातकर्मों को सदा छुपाकर रखने वालों पत्रकारों ने ‘बलात्कार, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, हत्या, राष्ट्र-द्रोह, दंगा-फसाद’ जैसे दागों समेत ऐसे कौनसे मुकाम हैं जो इन्होंने हासिल नहीं किये हैं. देश की विचार-चेतना पर झूठे आडम्बरों से सदा अपना वर्चस्व जमाकर बैठने की फिराक रखने वाली ऐसे पत्रकारों की जमात हर काल में मौजूद रही है और देश के भविष्य निर्माण के फैसलों में बाह्य-प्रयासों से अपने स्वार्थ का विष घोलने का प्रयास करती रही है.ऐसी पीत-पत्रकारिता ने हर उस शाख्सियत को अप्रासंगिक बनाने में, उसकी छवि को मिटटी में मिलाने की कोई कसर नहीं छोड़ी जिसने देश और समाज को सही मायने में कुछ दिया है और उसके चिर स्थायित्व का प्रयास किया है. इतिहास को टटोल कर देखें तो भारतीय अध्यात्म और हिंदुत्व सनातनी दर्शन की अगुवाई करने के लिए जब-जब भी कोई खड़ा हुआ तो उन्हें इसी पीत-पत्रकारिता ने अब्राहमिक वैचारिक आक्रांतों के तहत विवादित किया है और मिथ्या मतान्तर पैदा कर समूचे जनमानस को विनाश के गर्त की ओर धकेला है. ऐसा आज भी अनवरत जारी है, पिछ्ले कुछ वर्षों में हुए हिन्दू संतों के विवादों को यदि शोध के नजरिये से देखा जाये तो यही निष्कर्ष सर्वोपरि ठहरेगा.इसीलिए भगतसिंह, सावरकर, तिलक आदि की खोई हुई पत्रकारिता कदाचित ही आज संभव हो पाए. इस जमात में से शायद ही कोई प्रेरणा ले पाए स्वामी चिन्मयानन्द जी से जिन्होंने स्वामी शिवानन्द जी का साक्षात्कार क्या किया अपने जीवन के मकसद का ही साक्षात्कार कर लिया और विघटनकारी पत्रकारिता की क्षुद्र ललक का परित्याग कर चिन्मय मिशन जैसी सेवा गंगा का शुभारम्भ किया ।

पत्रकारिता जमीन से कटकर चंद बड़े व प्रभावशाली व्यक्तियों की दासी होती जा रही है. वह समाज और व्यक्ति के साथ विश्वासघात करने में नहीं चूकती. मनगढ़ंत आधारों पर किसी का चरित्र हनन करने में देर नहीं लगाती....मैं उसका भुक्तभोगी हूँ ।

इसीलिए इस लेख का इस जमात में से किसी को झकझोर देना - ऐसा मकसद तो कतई नहीं है, क्यूँ कि दंभ और अभिमान के आंतरिक शोर से बहरों को जगाने के लिए ऊँचे स्वर में गरियाने का व्यर्थ परिश्रम नहीं करना चाहते हैं लेकिन सरल हृदयी पाठकों के समक्ष इनका चिरहरण कर इनके पाखंड स्वरुप को नग्न करने की जेहमत अवश्य है. सो इतिहास में कुछ समय पीछे लौटते हुए देखते हैं कि जब स्वामी विवेकानंद जी को इस धरा की पीड़ा दूर करने के लिए शिकागो की यात्रा करनी पड़ी और इस युवा योगी के विद्युत स्पर्शी विचारों ने भारतीय अध्यात्म के दर्शन को विश्वके मानस-पटल पर रखा तो पश्चिम दंग रहा गया और फिर इससे जो उनकी प्रसिद्धि हुई उसने उनके खिलाफ ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित पत्रकारों के जरिये बदनामी का ऐसा प्रोपेगेंडा रचा जो उनकी हत्या करवाने तक उतारू हो गया. स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी पर उपन्यास के लेखक रहे श्री राजमोहन भटनागर ने अपने उपन्यास में बखूबी उनको बदनाम करने की इस बात का विस्तृत उल्लेख किया है. ऐसे ही कुछ प्रसंगउनके उपन्यास सेसंकलित किये हैं -

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बिजली भी अभी गिरनी थी. ‘नॉर्दम्पटन डेली हेराल्ड’ , ‘बोस्टन’ , ‘इवनिंग ट्रांसक्रिप्ट’, ‘क्रिस्चियन एडवोकेट’, ‘डिट्रॉइट ट्रिब्यून’ , ‘डिट्रॉइट जनरल’ आदि अचानक टूट पड़े और उन्हें रंगीला बाबू, युवतियों से घिरा बदचलन साधू, कानन्द की कमर तथा जांघों को उघाड़कर दर्शाया गया स्वप्न, अवयस्क नौकरानी से संबंधों की गाथा, ‘सेवर हॉल’ के सामने जहां उन्होंने व्याख्यान दिया था, टँगाएक अर्द्धनग्न लड़की के साथ दिखाया गया था.

मिशनरियां उनके पीछे पड़ी थीं और प्रताप मजूमदार अमेरिका में अपनी चाल में सफल नहीं होने की वजह से कलकत्ते आकर उनका चरित्र हनन करने लगे थे. उन पर जालसाज, ठग, बहु स्त्रीगामी आदि के आरोप लगवा रहे थे. उन्हें हिन्दुओं के किसी संप्रदाय का प्रतिनिधि न बताकर खिल्ली उदा रहे थे. वे गायक हैं. अभिनेता हैं.

उधर ‘डिट्रॉइट फ्री प्रेस’, ‘आउट लुक’, ‘बोस्टन डेली एडवरटाइजर’ आदि ने उन्हें स्वेच्छाधारी रमणी प्रेमी’ आदि संज्ञाएँ दे दीं. ‘इंटीरियर’ पत्रिका ने उनके सम्बन्ध में भोंडे समाचार छापे. मिशनरियों को मिलने वाले वाले दान में दस लाख पौंड की कमीं आ गयी. वे तिलमिलाए और ऐलान कर बैठे कि उस दुष्ट विवेकानंद का वे सर्वनाश करके रहेंगे.

उन्हें इस दुष्प्रचार का जरा-सा भी मलाल नहीं था और न चिंता थी. इस कारण बहुतों के कहने पर भी उन्होंने दूषित, गंदे और अश्लील दुष्प्रचार का प्रतिवाद नहीं किया. ‘बोस्टन डेली एडवरटाइजर’ से ब्लू बारबर उनसे साक्षात्कार लेने आया . वह पूछने लगा, ‘आप यहाँ कब तक रहेंगे ?”

“जब तक मन चाहेगा और अमेरिका सरकार को आपत्ति नहीं होगी. ”

“पर क्यों ?”

“यहाँ के जीवन में आ रही दरारों को भरने के लिए और वेदांत की पहचान कराने के लिए.”

“आपके दुराचरण से परेशान होकर श्रीमती बागले, मिशीगन के भूतपूर्व गवर्नर की पत्नी, ने अपनी अल्पवयस्क नौकरानी को निकाल दिया”

“यह सब छप चुका है.”

“आपको क्या कहना है?”

“इसके लिए कृपया आप श्रीमती बागले से पूछें और उनकी बात पर विश्वास करें. और नीर-क्षीर विवेकी बनने की इच्छा हो तो उस नौकरानी से जाकर पूछें. थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ेगी.”

“आपको कुछ नहीं कहना ?”
“नहीं.”

“श्री हेल ने अपनी पुत्रियों को आपसे मिलने से रोका है?...क्यों?”

“क्योंकि उनकी दोनों अविवाहित पुत्रियाँ यहाँ मेरे साथ बैठी हुई हैं...उनसे पूछकर देखिये – परन्तु मेरे सामने नहीं, अलग से.” कुछ रुककर विवेकानंद ने कहा, “आप भाग्यशाली हैं. श्री बागलेऔर उनकीवह नौकरानी जिसे आपके अख़बार ने विवश होकर निकालना पड़ा लिखा है, “वे आ रहीं हैं.”

ब्लू बारबर को ठण्ड में भी पसीने आ गए. परन्तु वह झेंप के कारण रुमाल निकाल कर अपना मुंह नहीं पोंछ पा रहा था. विवेकानंद ने कहा, “ब्लू बारबर, कृपया पहले अपना पसीना पोंछ लें. मुझे दुःख तो इस बात का है कि यहाँ पत्रकारिता का चरित्र अविश्वसनीय है. यह यहाँ की सेहत के लिए अशुभ लक्षण है. ...मुझे और कुछ नहीं कहना है और जो कहा है, वह छपेगा नहीं क्योंकि पत्रकारिता पर ऊँगली उठती है.” विवेकानंद उठकर चल दिए. ब्लू बारबर पसीना पोंछता हुआ रह गया.

यह कैसा देश है कि भौतिक प्रगति के सामने शेष सबको गौण मानकर चल रहा है. प्रगति में न्याय-अन्याय, अधिकार- अनाधिकार, सत्य-असत्य आदि किसी की भी चिंता नहीं कर रहा है. एक ओर बैप्टिस्ट, मेर्थोडिस्ट, प्रेसबिटेरियन आदि सभी उनमें आस्था रख रहे हैं और दूसरी ओर मुठ्ठी भर धर्माचार्य उनके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं. वे कैसे धर्माचार्य हैं जो ईर्ष्या-द्वेष से बेतरह जल रहे हैं. और वे सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं.

ऐसे ही अन्य संस्मरण में जब ‘मरीन न्यूज’ के सह-संपादक ब्राउनिंग मार्क्स ने कुटिल मंशा से जब स्वामी विवेकानंद जी का साक्षात्कार लेने के पहुँचते हैं तो ब्राउनिंग मार्क्स उस युवा योगी के तेजस्वी और मर्मभेदी विचारों से अपने आप को इतना झकझोरा हुआ पाता है कि उनके प्रति बनी हुई मिथ्या अवधारणा का तृण-तृण क्षण में खाक हो जाता है. पढ़िए -

“ अनुमति हो तो मैं आपका साक्षात्कार ले लूँ”

विवेकानंद ने ध्यान से ब्राउनिंग मार्क्स की ओर देखा और कहा, “मार्क्स, बात अनुमति की नहीं है, उसे अक्षरश: छापने की है कि कयोंकि तोड़-मरोड़ बहुत हो जाती है. फिर लगता नहीं है कि मैंने क्या कहा था और उसका सन्दर्भ क्या था?...उस साक्षात्कार से क्या लाभ?”

“ऐसा नहीं होगा.”

मुझे भय यह है कि पत्रकारिता पाखंड हो गयी तो उसके परिणाम सारे विश्व को दारुण कष्ट देंगे. ... पत्रकारिता में से पारदर्शिता को लुप्त हो जाने दीजिए, विश्व शीघ्र ही विनाश की ओर जा लगेगा...”

“आप विश्वास कीजिये.”

“मुझे तो विश्वास है, मार्क्स, पर क्या तुम्हें भी अपने पर विश्वास है? यह प्रश्न उत्तर देने के लिए नहीं, मनन करने के लिए है. ...मैं अमेरिका, यूरोप आदि से होकर लौटा रहा हूँ तो मुझे अनुभव हुआ कि पत्रकारिता जमीन से कटकर चंद बड़े व प्रभावशाली व्यक्तियों की दासी होती जा रही है. वह समाज और व्यक्ति के साथ विश्वासघात करने में नहीं चूकती. मनगढ़ंत आधारों पर किसी का चरित्र हनन करने में देर नहीं लगाती....मैं उसका भुक्तभोगी हूँ.”

“मैं आपसे वादा करता हूँ.”

“वादा नहीं, यह लिखकर दीजिये कि इस साक्षात्कार के छापने से पूर्व उसकी प्रति मुझे उपलब्ध करवाएंगे.”
“ठीक है.” कहकर उसने लैटर पैड पर लिखकर दे दिया और तब जाकर एक लम्बा साक्षात्कार चला जो मार्क्स के लिए जीवन परिवर्तन वाला साबित हुआ.

लेकिन आज के दौर की यह जमात ब्राउनिंग मार्क्स जैसी भली पात्रता तो रखती नहीं दिखती है. यह तो अपने अहंकार का ऐसा मोटा मुलम्मा चढ़ाये बैठी है कि वर्षो तक दर्पण दिखा-दिखाकर घिसने का परिश्रम भी किया तो भी नहीं उतरेगा है. इसीलिए पीत- पत्रकारों के धातकर्मों का सिलसिला यदि एक सीमा से बाहर हो जाये तो नैतिकता से गिरे ऐसे उद्दंड पशुओं को डंडा दिखाकर हांकना आवश्यक हो जाता है. इसीलिए देश की त्रस्त जनता ने गतवर्ष में राजनीति के पृष्ठभूमि पर एक बड़ा उलटफेर किया है वैसे ही उलटफेर करने के लिए यही मानसिक रूप से त्रस्त जनता अब इस पीत-पत्रकारिता के खात्मे करने के लिए भभक रही है. इसके चिन्ह हाल ही में दिखायी दिए हैं जब ऐसे पत्रकारों के पब्लिक कार्यक्रमों में अपने बनावटी रूख को जनता की आवाज के रूप में थोपने की कोशिश की है तो उमड़ी भीड़ ने सरे आम इनका पब्लिक ट्रायल कर दिख लाया है. इसीलिए लोगों के चेहरे पर झलका गुस्सा इसी ओर ही दस्तक दे रहा है कि न जाने कब विस्फोट हो ले? इनको गरियाने के लिए नित नवीन शब्दावली का उभर कर आना भी इसी गुस्से की परिणीति है.

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