संत आसाराम बापू : आखिर विवादों का अंत क्यूँ नहीं ?

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Sant Shri Asaram Ji Bapu: From Legacy to Conspiracy.

पिछले दिनों आध्यात्मिक जगत के बड़े नाम संत आसाराम बापू पर यौन दुराचार के आरोप लगने के बाद हुई गिरफ़्तारी ने अध्यात्म-प्रेमियों को असमंजस के बीच ला खड़ा कर दिया है । उनकी चालीस वर्षों की मधुर-मधुर नाम हरि ओम धुन को ना जाने कैसी टेक लगी है कि एक के बाद एक सिलसिलेवार लगे आरोप थमने का ही नाम नहीं ले रहे हैं । उनके लिए 2008 से शुरू हुआ यह बुरा दौर लगातार जारी है जहां मीडिया और न्यायिक प्रकिया के वाम-वर्ग उनकी छवि को धूल-धूसरित कर उन्हें अपराधी सिद्ध करने पर तुले हुए हैं ।

बापू की लोक कल्याण-यात्रा का सफ़र लगभग अस्सी के दशक से शुरू हुआ । आलम यह था कि लाखों श्रोता दर रोज सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर आने वाले उनके प्रवचनों सुनने के उत्सुक रहते थे । उनका लोगों के बीच जाकर उनके दुःख-दर्द में सहभागी होना, उनकी समस्याएं सुनना आदि ने उनकी सत्संग-प्रवचनों के साथ लोगों से जुड़ने की प्रक्रिया ने उन्हें इतना प्रभावी बना दिया कि उनकी छवि लोक संत के रूप में प्रख्यात होने लगी । धीरे–धीरे उनके सत्संग-प्रवचनों का कारवां हर छोटे-बड़े शहर में पहुँचने लगा। जैसे ही उनके प्रवचनों के पोस्टर चस्पा हुए कि लोग दौड़े हुए चले आते । वे अपने प्रवचनों में व्यक्ति-निर्माण, राष्ट्रीय विचारों एवं सामाजिक- मूल्यों पर जोर देते हुए योग और स्वास्थ्य लाभ के सरल उपाय बताते । यही कारण है कि उनके सहज सुलभ प्रवचनों ने उन्हें प्रसिध्दि का वह मुकाम दे दिया जो शायद ही किसी आध्यात्मिक गुरु को मिला हो। इस दौरान उनके लिए बड़ा पड़ाव तब आया उन्हें 1993 की शिकागो धर्म-संसद के सेंटेनरी समारोह में धर्म-संसद के लिए भारत के प्रतिनिधित्व के लिए चुना गया। इसी समारोह में उनके व्यक्तित्व की शक्ति ने विभिन्न देशों से आये श्रोताओं के मानस पटल पर ऐसी छाप छोड़ी कि निर्धारित समय सीमा को लांघकर घंटों तक मन:तटस्थ होकर अनवरत रूप से सुनते रहे । उनके इस वक्तृत्व को शिकागो के नेशनल ब्रोडकास्टर ने तो एक्सक्लूसिव तौर पर प्रसारित भी किया । वर्षों तक इंडोनेशिया और साऊथ एशिया में एक क्रिश्चियन मिशनरी के लिए कार्य करने वाले डॉ. राबर्ट सोलोमन ने पहली बार बापू को इसी मंच पर सुना तो वे उनसे ऐसे प्रभावित हुए कि मिशनरी छोड़ बापू से हिंदू धर्मान्तरित होकर भारत में आ बसे । उन्हीं के शब्दों में, “बापू की वाणी का प्रभाव गजब का था। उनका भारतीय सनातन संस्कृति का विश्व-मैत्री और वसुधैव कुटुम्बकम का सन्देश वाकई मेरे लिए आँख खोलने वाला रहा । जहाँ एक ओर तमाम मिशनरीज धर्म-प्रचार की कुंठा से ग्रसित होकर एक एजेंडा के तहत भारत जैसे कई देशों की मौलिक संस्कृति को विकृत कर समाप्त करने पर और पुरजोर धर्मान्तरण में जुटी हुई है वहीं दूसरी ओर जब उनको सुना तो ऐसा लगा कि शायद जीसस की बाइबिल का असल मैसेज यही है और मैं मिशनरी छोड़ आया ।”

लेकिन वक्त के साथ यह जन-कल्याण की मुहिम बापू के विरोधियों के लिए कब आँख की किरकिरी बन बैठेगी कि उनके चाहने वालों ने कभी सोचा भी ना था !

नब्बे के दशक का मध्य संतश्री के लिए वह समय रहा कि जब उनके सत्संग-प्रवचनों की आंतरिक धारा भारतीय मानस-पटल पर सर्वाधिक लोकप्रिय होकर चहुँ आयामी हो रही थी और एक बड़ा धर्म-पिपासु वर्ग उनके श्रोताओं के तौर पर लालायित हो रहा था । राजधानी दिल्ली से जुड़े उनके कुछ श्रोताओं के जेहन में उनके बापू से जुडने की यादें आज भी ताजा हैं । वे कहते हैं – “बापू का विश्व-शांति सत्संग समारोह था । कई दिनों तक चलने वाले इस प्रोग्राम में लाखों-लोग सत्संग के लिए जमा हुए थे । हमने बापू को सबसे पहले वहीं सुना । उनके इस समारोह से वसुधैव-कुटुम्बकम को जीवंत करने की इस मुहिम का यहाँ तक कि बड़े –बड़े राजनयिकों ने भी स्वागत किया । कार्यक्रम की समाप्ति पर स्कूल के बच्चों से लेकर युवाओं और प्रबुद्धजनों का काफिला विश्वशांति का सन्देश लेकर इण्डिया-गेट से जो गुजरा लगा कि भारतीय अध्यात्म की ऐसी पुरजोर पहल कभी ना हुई थी और ना ही कभी देखी थी ।” गौरतलब है कि बापू पहले ऐसे आध्यात्मिक संत रहे हैं जिनकी जीवनी स्वयं राष्ट्रीय प्रसारणकर्ता दूरदर्शन ने प्रसारित की है । उनके जीवन और सेवा प्रकल्पों पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री “कल्पवृक्ष” का 9 मार्च 1995 को टेलीकास्ट किया तो इसके रेस्पोंस में हजारों पत्र दूरदर्शन को मिले जिसके बाद दूरदर्शन को इस डॉक्यूमेंट्री को पुन: प्रसारित करना पड़ा । साथ ही दूरदर्शन ने बापू के लोकप्रियता देख उनके सत्संग प्रवचनों पर आधारित एक नया प्रोग्राम “ज्योति कलश” ही शुरू कर दिया । ऐसे में भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री में आध्यात्मिक चैनलों की शुरुआत की नींव यदि बापू के प्रवचनों की लोकप्रियता की वजह से पड़ी है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । इसी लोकप्रियता के चलते जी.टी.वी जब पहली बार अध्यात्म पर आधारित अपने साप्तहिक सीरियल “जागरण” को प्रसारित करने लगा तो देश-विदेशों से आने वाले पत्रों के अंबार ने पहले इसे दैनिक प्रसारित कार्यक्रमों में और बाद में देश के पहले आध्यात्मिक चैनल “जी जागरण” के लिए शुरू करने पर विवश होना पड़ा । कनाडा में प्रवासी भारतियों द्वारा स्थापित एक रेडियो स्टेशन ‘ज्ञानधारा’ पर तो बापू के प्रवचन आज भी विशेष रूप से प्रसारित किये जाते हैं । भारतीय प्राचीन संस्कृति, अध्यात्म, योग और मानवीय-मूल्यों से गुंथे अपने इन प्रवचनों को तकनीकी के माध्यम से दूर-दराज तक सर्व-सुलभ करने में जुटे बापू ने कभी इसे व्यवसाय का माध्यम नहीं बनाया । आज जहाँ एक ओर दर्जनोंभर आध्यात्मिक चैनलों पर सैकड़ों प्रवचनकर्ताओं और महामंडलेश्वरों की इस बाढ़ में पैसों से प्रवचनों को दिखाने की प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरुप उपजे इस व्यवसाय से उन्होंने शुरूआत से ही अपने को और अपने प्रकल्पों को इन विज्ञापनों के आडम्बरों से कोसों दूर रखा है, तभी तो बिना मूल्य लिए प्रसारण करने चैनलों को अव्वल नंबर की टी.आर.पी दिलाने वाले उनके प्रवचनों का प्रसारण जबसे उन पर ये विवादों की आंधी आयी, तब से शून्यभर सा हो गया है ।

एक बार तथागत बुद्ध ने अपने शिष्यों को उद्बोधित करते हुए कहा था मैं उस ओर चल चुका हूँ जहाँ चरित्र पर कालिख पुतना तय है । समय के साथ बापू भी अपने लोक-कल्याण के इस मिशन- सबके के लिए “सुखी-जीवन, स्वस्थ-जीवन और सम्मानित जीवन” के लिए और भी दृढवत हो चुके थे । उन्होंने आश्रमों और सेवा-केन्द्रों के दायरों को बढ़ाते हुए समाज-कल्याण के लिए एक के बाद एक ‘नारी-उत्थान आश्रम’, ‘आदिवासी विकास’, ‘दहेज जैसी सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन’, ‘बाल-संस्कार केन्द्र’, ‘वानप्रस्थ वृद्धाश्रम’, ‘नशा मुक्ति अभियान’, ‘गरीबों हेतु रोजगार योजना’ ‘भूकंप-बाढ में सहायता’ और ‘गौशाला’ आदि बड़े प्रकल्प खड़े कर अध्यात्म को सामाजिक सरोकारों की एक क्रांति में तब्दील कर रख दिया । बापू के इन जन-कल्याण के प्रकल्पों की खास बात रही कि इनके केन्द्रों में समाज का वह गरीबतम तबका जो अब तक व्यवस्था की सुविधाओं से वंचित और प्रताड़ित रहा है, हमेशा प्रधान रहा है । अपने अनुयायियों को ‘अपने घरों में दीपावली मनाने से पहले पडौस के किसी गरीब के घर में दिया पहले जला आओ, थोड़ी सी मिठाई दे आओ’ का सन्देश देने वाले बापू ने हमेशा से उन स्वरोजगारोन्मुखी छोटे-छोटे ग्रामीण, निम्न-मध्यम वर्गीय समूहों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए बढावा दिया है जहां सरकारों की बड़े बजट वाली योजनाएं भी घोर अप्रभावी रहीं हैं । उदाहरणतय हैदराबाद, भुवनेश्वर, गुजरात और राजस्थान के अतिपिछड़े इलाकों में गेंहूँ, चावल और खाद्यतेल इत्यादि रोजमर्रा की चीजों का जरूरतमंद गरीबों के लिए स्व-स्थापित राशन प्रणाली का सुचारुरूप सञ्चालन करना । “भजन करो-भोजन करो-रोजी पाओ” राजस्थान और महाराष्ट्र सूखाग्रस्त ग्रामीण इलाकों में शुरू की गयी रोजगार के साथ एक वक्त का भोजन मुहैया करने की एक ऐसी स्वयंसेवी राहत योजना रही है जो राहत के नाम पर चल रही शासन की कई योजनाओं की कमीं पूरी कर सत्ता के कोरे दावों की कलई खोलकर वास्तविकता से परिचय कराती है । स्वयं बापू भी समय-समय पर विशेषकर त्यौहारों पर विभिन्न इलाकों का सर्वे करवाकर सीधे उन जरूरतमंदों के बीच पहुँचते रहे हैं । उनके इन जमीनी स्तर के कारगर उपायों को स्वतंत्र पर्यवेक्षक सदा कमतर आंकने या ना पहचानने की भूल करते रहे हैं । उनकी इस उद्यमिता का और मूल्यांकन महज उनके सत्संग-प्रवचनों में लाखों की उमडती भीड़ के साथ इन्हीं निम्न-मध्यमवर्गीय लघुतर सहकार-समूहों द्वारा निर्मित आयुर्वेदिक दवाईयों, सत्-साहित्य, रोजमर्रा के खाद्य-पदार्थों के रसोईघर के घी-आचार-मसाले, पहनने-ओढने के कपडे, बर्तन-इत्यादि, फल-सब्जियों, स्टेशनरी उत्पादों की लगी छोटी-छोटी फुटकर स्टॉलों से उभरती हुई उस तस्वीर से किया जा सकता है जहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े खर्चीले, आकर्षक पैकिंग वाले उत्पादों और भरपूर लाभांश के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा को हाशिए पर कर श्री राजीव दीक्षित जी द्वारा प्रणीत उस स्वदेशी-स्वाभिमानी-सांस्कृतिक अर्थव्यवथा की अवधारणा को बखूबी गढा हुआ देखा जा सकता है जिसे उन्होंने सर्वप्रथम बापू के संयोजन में ही लोकशिक्षण में लाया था । स्वयं बापू भी कई मर्तबा जाहिर तौर पर कहते रहे हैं कि कई औषधीय खेती गरीब आदिवासियों से करवाता हूँ । ये जो होली के निमित्त प्राकृतिक रंग बनता है उसके लिए केसुडे के फूल उन गरीब आदिवासियों से लेता हूँ । बेचारे उनको भी दो-चार पैसे मिल जाते हैं । नहीं तो कौन पूछता है उन्हें ?

लेकिन वक्त के साथ यह जन-कल्याण की मुहिम उनके विरोधियों के लिए कब आँख की किरकिरी बन बैठेगी कि उनके चाहने वालों ने कभी सोचा भी ना था ! इससे भी आगे जब उन्होंने अपने जन-कल्याण के प्रकल्पों को गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश के ऐसे आदिवासी ग्रामीण पर्वतीय और वन्य इलाकों में ला खड़ा कर दिया जहाँ सड़कों, बिजली-पानी, शिक्षा और अस्पतालों आदि विकास के साधनों से दूरतलक कोई वास्ता नहीं तो वहाँ के जनमानस में मजबूत होती उनकी पैठ के परिणामस्वरुप कतिपय धार्मिक और राजनैतिक विरोधी अपने ढकोसले उधड़ते देख उनके खिलाफ अपने सुरों को लामबंद कर इस तरह से पीत-पत्रकारिता और छद्मी संगठनों के माध्यमों के द्वारा कई सालों तक साजिशाना बदनाम करते हुए जेल की चार-दीवारियों के पीछे घसीट लायेंगे, वाकई एक वक्त की धुरी परिवर्तन जैसा है । सन नब्बे के बाद के इस दौर में जब दक्षिणी गुजरात के धरमपुर, नानापोंधा, भैरवी, जिला डांग, दक्षिणी राजस्थान और उत्तरी गुजरात की सीमा पर बसा हुआ कोटडा (उदयपुर), दक्षिणी राजस्थान के जिलों की ट्राइबल बैल्ट के सागवाडा, प्रतापगढ़, कुशलगढ़, नाणा, भीमणा, सेमलिया, मध्यप्रदेश में रायपुरिया, गढ़खंगाई, सैलाना, सागर, सरवन, अमझेरा और महाराष्ट्र के नावली (वाशिम), खापर, जावदा, प्रकाशा आदि इलाकों में गरीब आदिवासियों को क्रिश्चियन धर्मसंस्थाओं द्वारा बहला-फुसलाकर और डरा-धमकाकर धर्मान्तरण की गतिविधियां अपने चरमपर थीं । इन इलाकों में भोलेभाले गरीब, दलित और अशिक्षित आदिवासियों को पैसों का लालच देकर, उनकी बीमारियों के दवाई और इलाज के नाम पर, उनके बच्चों को शिक्षा और अन्य सुविधाओं के लाभ पर, उनके घरेलू झगडों में मदद के नाम पर धर्मान्तरण करने और धर्मान्तरित न होने पर हिंसा समेत कई अमानवीय घटनाएं आये दिनों सुर्ख़ियों में रहने लगीं थी । डांग को तो लगभग ‘नागालैंड इन वेस्ट’ कहा जाने लगा । सन 1998 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा क्रिश्चियन मिसनरीज की गतिविधियों जाँच के लिए स्थापित नियोगी कमीशन की दूसरी बार प्रकाशित रिपोर्ट ने भी इसे और भी पुष्ट कर दिया । साथ ही रोमन कैथोलिक डायोसेस, गोस्पेल ऑफ चर्चेज फेडरशन ऑफ इंडिया, जेश्यूत मिशन और उसी दौरान नवगठित आल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल जैसी संस्थाओं द्वारा स्थापित स्कूल-कॉलेजों, अस्पतालों और केन्द्रों की संख्या में हुई अभूतपूर्व बढोतरी के साथ जनगणना में ईसाईयत के बढते हुए आकडों ने इस छद्म-एजेंडा को और भी प्रमाणित कर रख दिया । ऐसे में बापू द्वारा इन्हीं इलाकों में बड़े स्तर पर आदिवासी कल्याण आश्रम स्थापित कर, दूर-दराज के गांव तक जाने वाली मोबाईल डिस्पेंसरीज, डायग्नोस्टिक लैब्स एवं दवाईयों से लैस वैन्स जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं, उच्चस्तरीय अस्पतालों, मिशन के तौर पर खोले गए फ्री-स्कूलों एवं गुरुकुलों, खाद्यान्न व कपड़ों समेत जरुरत की चीजों का वितरण हेतु योजनाओं का सञ्चालन कर और उनके वन्य-उत्पादों पर आधारित छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर, उनके कच्चे माल का खरीददार बन उन धर्म से टूटते हुए धनाभाव में तिल-तिल करते हुए आदिवासियों के मन में हिंदू-सनातन धर्म के प्रति गर्व की भावना ऐसा संवर्धन किया कि उनके प्रयासों से हिंदुत्व विचारधारा की तूती बोल उठी और इसके सापेक्ष उनके विरोध के नए आयामों का अभिर्भाव भी हो गया । सन 2006 में जब गुजरात के डांग में धर्मान्तरण के खिलाफ बुलंद होती हुई आवाज़ और दबाब पूर्वक क्रिश्चियन बनाये गए दलित वनवासियों के हिंदू सनातन धर्म में ‘घर वापसी’ के लिए रामायण वर्णित ‘शबरी और श्रीराम के संस्मरण’ से जोड़, उन वनवासियों के मानस में गर्व की भावना उकेरने और इस इलाके को नैसर्गिक देवस्थान के रूप में स्थापित कर पर्यटन और आर्थिक बढ़ावा के लिए प्रमुख हिंदुत्व-संस्थानों व संत आसाराम बापू समेत संत मोरारी बापू, साध्वी ऋतंभरा, शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती, संत नारायण बापू, साध्वी कनकेश्वरी देवी जैसे हिंदू धर्माचार्यों, तत्कालीन संघ प्रमुख श्री सुदर्शनजी, मोहन भागवत, शिवराज सिंह चौहान और माननीय नरेन्द्र मोदी के तत्वाधान शबरीधाम की आधारशिला रखी गयी तो बापू ने शबरी कुम्भ के मंच से इस मुहिम की अगुवाई करते हुए संबोधन किया - “सुधरने की सीजन है, भैय्या सुधर जाओ...इन भोले-भाले आदिवासियों से उनकी प्राचीन वन्य आधारित हिंदू संस्कृति और परम्पराओं से विमुख करने का प्रयास न करो, इन्हें डरा-धमका कर या धन का लालच देकर धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किया जायेगा तो हम चुप बैठने वालों में से नहीं है ।

बापू ने हमेशा से उन स्वरोजगारोन्मुखी छोटे-छोटे ग्रामीण, निम्न-मध्यम वर्गीय समूहों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए बढावा दिया है जहां सरकारों की बड़े बजट वाली योजनाएं भी घोर अप्रभावी रहीं हैं ।

बापू के लिए ये बदनामी की परिस्थितियां तब सँभलने से बाहर हो गयी जब सन 2008 में उनके अहमदाबाद गुरुकुल में पढ़ने वाले दो छात्रों की असामयिक मौत के बाद उनके आश्रमों में काला जादू के उपयोग करने, दर्जनों भर आश्रमों की जमीनों पर अतिक्रमण करने, आश्रम में समर्पित साधकों और महिलाओं के रहस्यमयी गायब होने और यौन शोषण होने, देश-विदेश में फैले उनके आश्रम की संपत्तियों और अनियमित वित्तीय व्यवहारों समेत एक के बाद एक संगीन आरोप लगने लगे और उन्हें दररोज निशाने पर लिया जाने लगा । बापू पर लगे आरोपों के दरमियान एक अनजाना पक्ष जिसे हमेशा से बड़े स्तर पर मीडिया द्वारा दबाया गया, यह निकलकर आता है कि उनको सिलसिलेवार फँसाने की कोशिशें लंबे अरसे से होती रही हैं । जब उनके गुरुकुल में बच्चों की असामयिक मौत की घटना हुई तो इस मुद्दे को राजनीतिक परवान चढाने के लिए अहमदाबाद समेत आसपास के शहरों में हिंसा-पथराव और आगजनी कर ऐसा माहौल रचा गया कि समूचा अहमदाबाद जो कल तक उनके प्रवचनों को गर्व का विषय मानता था, उनके खिलाफ खड़ा हुआ आक्रोशित खड़ा हुआ दिखाई दे । रातोंरात बनी हुई कांग्रेस समर्थित ‘जागेगा गुजरात संघर्ष समिति’ जैसी संस्थाएं विरोध प्रदर्शन और अहमदाबाद बंद के लिए ठेकेदार बन बैठीं और एक बड़े स्तर पर जाँच का राग आलापने लगीं । गुजरात के एक बड़े अखबार ‘संदेश’ और कुछ एक न्यूज चैनलों ने उनकी संस्था से टूटे हुए लोगों की मिलीभगत से ‘बच्चों की मौत काला जादू कर, भाजपा के बड़े नेताओं को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने के लिए बलि देने’ जैसे प्रपंच का ऐसा ताना-बाना बुना गया कि गुजरात की नरेन्द्र मोदी सरकार (जो बापू के कार्यों की सदा हिमायती रही थी) और बापू की संस्था एक टकराव के लिए आमने-सामने खड़े कर दिए जायें और इस कार्य के लिए न्यूज चैनलों और तथाकथित अखबार ने उनके आश्रम से टूटे हुए लोगों से प्रेस-कांफ्रेंस प्रायोजित करवाकर, कैमरे के सामने एक झूठी महिला और तांत्रिकों के बयानों के द्वारा ऐसी-ऐसी मनगढंत कहानियों का लाईव प्रसारण कर बापू के विरोध में माहौल तैयार कर दिया कि गुजरात सरकार को इस विषय की जाँच के लिए एक जाँच आयोग – जस्टिस डी के त्रिवेदी कमीशन स्थापित करना पड़ा । हालाँकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट “बच्चों की मौत को नैसर्गिक होना (जैसा कि ऑटोप्सी रिपोर्ट भी कहती है) न कि किसी काले विद्या के उपयोग से होने से” करार देकर बापू के आश्रम को बरी कर चुका है । और तो और जब आयोग की जाँच जैसे आगे बढती गयी काले जादू के मीडियाई दावों कलई खुलती गयी है । उनके आश्रमों में काले जादू के सम्बन्ध में जब आयोग ने सारे खबरिया चैनलों और अखबारों को नोटिस जारी कर सबूत जमा करने को पूछ डाला तो सारे चैनलों और अख़बारों को साँप सूंघ गया और कोई भी मीडिया हाउस सबूत पेश करने की हिम्मत तक न जुटा पाया । उनकी संस्था से टूटे हुए लोग जो इस प्रपंच में टीवी स्टूडियो में आकर मनगढंत कहानियों को रूप दे चुके थे वे लोग भी गवाह के तौर पर आयोग के सामने पेश होने पर मुकरते हुए दिखायी पड़े । स्वयं विरोधी पक्ष के वकील लिखित में देकर काले जादू की दलील को महज एक कोरी अफवाह मान चुके हैं । संत आसाराम बापू की छवि विकृत करने की इस श्रृंखला में एक बड़ा हाथ उनकी संस्था से टूटे हुए लोगों का रहा है जिन्हें तमाम टीवी चैनल्स अपने स्टूडियो में बुला-बुला कर उनके द्वारा बताई गयी मनगढंत कहानियां और उनके “आश्रम में हो रहे गलत कामों की वजह से आश्रम छोड़ने, आश्रमों में अध्यात्मिकता न होकर पाखंड का होने और अपने ऊपर हुए अत्याचारों की दुहाई देने’ को एक तरफ़ा प्रसारित कर उनके लिए ‘जन-संवेदना’ और बापू के लिए ‘गालियाँ’ बटोरने का प्रयास ताल ठोक कर करते रहें हैं । दरअसल आश्रम से टूटे हुए लोगों की संख्या में वो लोग रहे हैं जब बापू का अध्यात्म आन्दोलन एक उफान पर था तो सैंकडो युवक-युवतियां बापू के भारतीय अध्यात्म से जीवन समन्वय कर समाज और राष्ट्र कल्याण के दर्शनानुसार कुछ-कर गुजरने की फ़िराक में जज्बाती फैसले लेकर उनके कारवां से आ जुड़े थे लेकिन समय चलते अपनी महत्वाकांक्षाओं को दरकिनार न कर पाए क्यूंकि समाज-कल्याण को सर्वोपरि लक्ष्य बनाकर निस्वार्थ समर्पण के लिए इन बापू के आश्रमों की संरचना-व्यवस्था में कार्यकर्त्ता को सिर्फ भोजन और रहने की सुविधा के साथ निजी खर्च और यात्रा खर्च के भत्ते के आलावा वेतन का कोई प्रयोजन नहीं रखा हुआ था । इसके आलावा ऐसे भी लोग इस जमात में शामिल रहे हैं जो अपनी उन्मुक्तता के चलते परिवारों के लिए परेशानियों का सबब बन चुके थे और बापू ने अपनी उदारता के चलते उन्हें सुधरने की गुंजाईश बख्सते हुए अपनाया था और जन कल्याण के प्रकल्पों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी। उदाहरण के तौर पर मीडिया में बापू के पूर्व सचिव के तौर पर दिखाए जाने वाले शख्स को राजस्थान के एक ग्रामीण इलाके में गौशाला के प्रोजेक्ट में बड़े राशि के गबन के चलते संस्था से निकाला गया था । समय के साथ इन सभी ने बापू की उदारता का भरपूर गलत फायदा उठाया है और आज अपनी व्यक्तिगत रंजिशों के चलते बरगलाने आ खड़े होते हैं । इनमें से कई तो संस्था से निकलने के बाद कई आपराधिक मामलों में भी लिप्त पाए गए हैं । परन्तु ऐसा नहीं है कि संस्था से टूटे हुए लोगों को बरगलाने वालों से जुड़े हुए तारों को खंगालने की कोशिश नहीं हुई है । 2010 में बापू के कुछ अनुयायिओं ने इन्हीं लोगों की बापू को बदनाम करने के लिए की गयी कारगुजारियों को ख़ुफ़िया कैमरे पर भी धरपकड़ा था और इस स्टिंग टेप पर कई ‘सन्देश’ और ‘इण्डिया टीवी’ के पत्रकारों समेत एक राजनैतिक पार्टी के नामों के खुलासे भी हो बैठे थे । लेकिन इस रसूखदार मीडिया-पॉलीटिकल गठजोड़ द्वारा इस बात को ऐसा दबा दिया गया कि मजबूरन यह बड़ा खुलासा कम पहुँच वाले अख़बारों और चैनलों के साथ सोशियल मीडिया के सीमित दायरे तक ही सिमट कर रह गया ।

Students attending class in primary school run by the Ashram in the tribal region of Gujarat

ऐसे में मीडिया चैनलों की टी.आर.पी. के लिए कभी खत्म न होने वाली भूख या फिर किसी के इशारों पर काम कर आज उनकी गिरफ़्तारी कराने में जिम्मेदार होने से कतई इंकार नहीं किया जा सकता । बापू और उनके अनुयायियों के लिए आम समाज में हेय दृष्टि और फब्तियों से भरा माहौल तैयार करने में तमाम मीडिया चैनल्स और प्रिंट मीडिया ना केवल सीधे तौर पर शामिल रहे हैं बल्कि सरकारी मशीनरी पर प्रेशर एजेंट का काम करने वाली पॉलीटिकल-कामरेड एक्टिविस्ट क्लास को टीवी पर बहसबाजी कराकर बापू को अप्रासंगिक और अपराधी पेश करने में तुले हुए साबित होते रहे हैं और उनके खिलाफ मोर्चा निकालने को भी सपोर्ट करते रहे हैं । बात जम्मू पुलिस द्वारा धोखाधडी के आरोपों में गिरफ्तार बृजबिहारी गुप्ता नाम के शख्स की ही लें । बापू की संस्था में कार्य कर चुका इस शख्स को सारे टीवी चैनलों ने बापू की गिरफ्तारी के दौरान सनसनी के तौर पर खुलासे करने के लिए पेश किया गया लेकिन पुलिस हिरासत में कबूलनामे में निकलकर आया कि इस शख्स को ‘इण्डिया न्यूज’ और ‘इण्डिया टीवी’ के रिपोर्टरों ने एक मोटी रकम देकर कैमरे पर बोलने के लिए तैयार किया गया था । इंदौर से बापू की गिरफ्तारी को इन खबरिया रिपोर्टरों ने प्रेस की स्वायत्तता की सारी सीमाओं को लाँघ सबसे तेज, सबसे अलग के फेर में जोधपुर लाए जा रहे विमान से लेकर पुलिस की गाड़ियों का पीछा करते हुए ऐसा पेश किया कि इसके एवज में अपने को एक देश और समाज के प्रति जिम्मेदाराना दिखाने का स्वांग रचने के लिए पुतले फूंकने और काली पट्टियाँ दिखाने, मुर्दाबाद के नारे लगाने सीपीआई (एम), आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां भाड़े के प्रदर्शनकारी लाकर जोधपुर के मुख्य चौराहों पर अटी पड़ी दिखायी दीं । ऐसा एक और वाकया मीडिया रिपोर्टर्स का इस मुद्दे पर किसी छिपे हुए दुराग्रह से ग्रसित होकर दोयम दर्जे की रिपोर्टिंग करने को पुख्ता करता है । जयपुर में बापू के बेटे नारायण साईं की संस्था के सेंटर पर मीडिया द्वारा मोब-ग्रुप्स जरिये इसीलिए हमला कराया गया ताकि बापू के खिलाफ जनता में उमड़े आक्रोश को टीवी पर दिखाया जा सके । जाहिर सी बात है कि बापू की गुडविल और क्रेडेंशियल को खत्म करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से उन्हें निशाने पर लेकर मीडिया चैनलों और अख़बारों के बदौलत प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है । इससे भी आगे बापू ने भी अपने बयानों में समय-समय पर इन ‘सुपारी जर्नलिस्ट्स’ की बखूबी खिंचाई कर और संस्था से धन ऐंठने की ताक में पेड-मीडिया समूहों के पैकेज ऑफर्स को ठुकरा कर इस लड़ाई की लकीर को और भी कुरेद कर रखा है । सन 2006 से दर्जनों भर लेख उनके विरोध में लिखे गए, भद्दे कार्टून बनाये गए, कवर स्टोरी बनाकर तमाम मैगजीन्स ने कवर पर छापा है । उनके बयानों को विकृत कर, काट-छांट कर एक तरफ़ा करके प्रसारित कर खूब बखेडा खड़ा किया गया है । कई आधारहीन तथ्यों से भरी ब्रेकिंगन्यूज, हेड-लाइन्स के टिकर्स जमकर टीवी स्क्रीन पर स्क्रोल किये गए । इस दौरान कई स्टिंग ऑपरेशन इरादतन तोड़ मरोड़ कर दिखाए गए । कई अख़बारों में हुबहू एक ही जैसे टाइटल की खबरें एक ही दिन छापी गयीं । गुजराती ‘सन्देश’ का तो सरस-सलिल जैसी अश्लील पत्रिका के माफिक बापू को अय्याश और विलासी सैक्स-गुरु की तरह काल्पनिक चित्रण और इसे नियमित जैकेट रूप में प्रकाशित करना बेहद निचले स्तर की पत्रकारिता भर है । दिल्ली में कमला मार्केट पुलिस स्टेशन पर बापू पर हुई एफ.आई.आर के सिलसिले में इस प्रदेश स्तर के अखबार की दिल्ली में स्थित मुख्यालयों वाले न्यूज चैनलों से पहले लपक लेना एक ऐसी छटपटाहट है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है । यदि पिछले साल जुलाई-अगस्त में बापू की गिरफ़्तारी से लेकर आम चुनावों की कवरेज को छोड़ दिया जाये तो टीवी पर सबसे ज्यादा एयर टाइम पर बापू से जुड़े प्रसारण ही छाये रहे । तमाम टीवी चैनल्स ने उनकी न्यायिक हिरासत में पूछताछ का मीडिया ट्रायल चलाने से लेकर खान-पान तक, बिस्तर व कपड़ों से लेकर टोपी के रंग तक, अस्पताल में मेडिकल टेस्ट, उनको पीडोफीलिक बताने में, उनके बेटे को भगोड़ा दिखाने में, आश्रम और ट्रस्टों की सम्पतियों का मनगढंत आंकलन करने में और आश्रम की जमीनों से जुड़े हुए मामले उखाड़ने में, आश्रमों को वेश्यालय से लेकर महिला अत्याचारों का गढ तक चित्रित करने के प्रयासों में क्या-कुछ कसर नहीं छोड़ी कि जिससे उनकी संस्था की नींव की आखिरी ईंट भी हिलाई जा सके । दीपक चौरसिया सम्पादित इण्डिया न्यूज जैसे चैनलों का ‘शिकारी आसाराम’, ‘आसाराम का लकी कबूतर’, ‘आसाराम के बेटे की सड़कछाप आशिकी’, ‘ऑपरेशन महापाखण्ड’ ‘भाग नारायण भाग’, ‘घरवाली-बाहरवाली’, ‘बाप नंबरी, बेटा दस नंबरी’, जैसे ढेरों फूहड़ और घटिया टाईटल्स के दररोज पैनल डिबेट्स शो आयोजित कर इस कदर तक चरित्र हनन में आ जुटना पीत-पत्रकारिता के ऊँचे मुकामों को पा लेना ही साबित करता है । तो ऐसे में अपने धार्मिक-विश्वास की भावनाओं को इन बेख़ौफ़ खबरिया चैनलों द्वारा इस तरह कुचलता देख बापू के अनुयायिओं के पास स्वायत्तपोषी मीडिया नियामक संस्थाओं, केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के विभागों और पुलिस में शिकायत-दर्ज करने के आलावा कोई चारा नहीं बचता सो वे ढेरों शिकायतें अपने स्तर पर करते रहें हैं लेकिन बाबा के लिए विषैले बना दिए गए माहौल में कोर्ट-कचहरी, पुलिस, कानून की मौजूदगी के बीच भी अपने को स्वतंत्र टापू मानने वाले राजनैतिक रसूखदार चैनलों पर कार्यवाही करे कौन ?

सवाल सिर्फ ‘कानून की समानता’ के चलते ‘एक साधू पर कानूनन प्रक्रियाओं के अंतर्गत कार्यवाही क्यों न हो?’ का ही नहीं है बल्कि उस छद्मीपने का है जिसके आड में बापू जैसे सामाजिक सरोकार रखने वाले बड़े अध्यात्मिक गुरु को निशाने पर लेकर साजिश की गुत्थियों में फाँस लेना है जिससे तमाम तरीके के राजनैतिक, धार्मिक एवं आर्थिक ध्रुवीकरण वाले लोगों के मंसूबे भलीभांति पूरे होते हों । साथ ही सवाल व्यवस्था के उस दोहरेपन का भी है जो बापू से जुड़े एक बड़े तबके की आवाज की अनदेखी करता रहा है, मीडियाई बवंडर के चलते उसकी आवाज़ को कुचलता रहा है, जो चीख-चीखकर बताता रहा है कि बापू को क्यूँ फंसाया गया है? बापू के पिछले चालीस वर्षों से अनवरत शांत रूप से चली आ रही इस परिवर्तन की पैरोकारी मुहिम में उनके खिलाफ जोधपुर और अहमदाबाद में यौन-शोषण के घिनौने आरोपों समेत कई स्थानों पर महिला-अत्याचारों के मामलों का यूँ अचानक एक के बाद उखडकर आ जाना ‘आरोपियों द्वारा उनकी संस्था वर्षों में हो रहे दबे हुए गंदे कारनामों का अब हिम्मत पाकर उजागर कर देना’ पिछले कई सालों से मीडिया और छद्मी संगठनों के माध्यम से फरेब लड़कियों को लाकर खड़े रखने के प्रयासों को देखकर तो कतई नहीं लगता है । इन्हीं में से कुछ छद्मी महिला संगठन, पिछले साल जब निर्भया बलात्कार केस में बापू की टिपण्णी को मीडिया द्वारा गलत-सन्दर्भ और विकृत करके प्रसारित किया तो बापू के लिए महिलाविरोधी, दकियानूसी, पोंगापंथी जैसी प्रतिकिया देकर अपनी छाती कूटती फिरती रहीं । देश को झंझोड़ने वाली इस घटना पर होहल्ला और कोरा दिखावा करने वालों के बीच बलात्कार पीडिता के प्रति पितातुल्य होकर शोक की अश्रुपूरित भावनाओं को जताकर पीड़ित परिवार को वित्तीय, कानूनी समेत सभी प्रकार की मदद की इच्छा रखने वाले बापू सबसे पहले थे लेकिन उनके विरोधी रही मीडिया को उनके इन बयानों को साइड-लाइन रख बखेडा जो खड़ा करना था,सो किया । परन्तु महिला सशक्तिकरण के ‘नारी तू नारायणी’ सूक्त को अपने प्रकल्पों में अमलीजामा पहनाने वाले बापू कभी महिलाविरोधी हो सकते हैं ? बड़ी नाजायज सी बात है । दहेज, बलात्कार, धोखधड़ी जैसी दुर्घटनाओं की शिकार समाज और परिवारों द्वारा तिरस्कार का दंश झेल रहीं ऐसी कई गरीब महिलाओं को बापू के महिला-उत्थान आश्रम द्वारा अपनाकर जीवन की उन बुलंदियों पर लाकर खड़ा कर देना जहाँ वे कुशल ओरेटर व जनकल्याण के कई प्रकल्पों में बड़ी जिम्मेदारियां निभायें कदाचित महिला-सशक्ति करना से कहीं कुछ ज्यादा है । उदाहरण के तौर पर सुदूरवर्ती आदिवासी इलाकों में मोबाईल वैन हॉस्पिटल्स का महिला-उत्थान आश्रम की महिलाओं द्वारा बखूबी सञ्चालन करना महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल है । फीमेल फोटीसाइड यानि कन्या भ्रूण हत्या के विषय को बापू दर रोज अपने प्रवचनों में उठाते रहे हैं । बापू न केवल अपने अनुयायियों को महिलाओं के प्रति दैवीय दर्शन के संस्कारों के हिमायती रहे हैं बल्कि प्रोफेशनल संस्थानों और मल्टी-नेशनल कंपनियों में हुए महिलाओं के शोषण और प्रताड़ित करने के विरोध में अपने प्रवचनों में भी डंके की चोट पर बोलते रहे हैं । कुछ वर्षों पहले मामले को रफादफा करने की फिराक में एक प्रतिष्ठित कपनी द्वारा उनकी महिला अनुयायी को शराब ऑफर कर सिगरेट से जलाकर प्रताड़ित करने की घटना जैसे उनकी नजरों में आयी तो इस घटना से भावविह्वल बापू ने जाहिर तौर पर ललकारते हुए कहा – “बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसे हरकतों से बाज आये नहीं तो आसाराम बापू देश की बच्चियों को छाती को कुचलने और मुक्का मारकर मुंह तोड़ने वाली बनाने का माद्दा रखते हैं ।” सामाजिक सरोकार से वास्ता रखने वाले ऐसे ही मुद्दों को बापू बेबाकी से उठाते रहे हैं चाहे वह रामसेतु परियोजना से जुड़ा मुद्दा हो या फिर मेडिकल के पेशे में डॉक्टरों के कुछ वर्गों द्वारा मरीज की बीमारी को खेल बनाकर पैसों की लूट-खसौट का हो । हालाँकि यह बात अलग है कि मेडिकल के पेशे में लालची डॉक्टरों का मुद्दा भले ही एक लोकप्रिय अभिनेता द्वारा अपने टीवी शो के जरिये सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का ढिंढोरा पीट लिया हो । रिक्शाचालकों, किसानों, मजदूरों, खोंमचे वालों जैसे जरुरतमंदों और गरीबों के लिए उनका दिल हमेशा से पसीजता रहा है और ऐसे कई उदाहरण है जहाँ बापू ने ऐसे लोगों को तात्कालिक आर्थिक मदद के साथ-साथ उनके भविष्य की व्यवस्था भी की है । पिछले दशकों से देश के विभिन्न भागों में आये प्राकृतिक आपदाओं के ऐसे कोई भी मौके नहीं होंगे जब उनकी संस्था की तरफ से बड़े स्तर पर राहत कार्यों को अंजाम नहीं दिया होगा । चाहे वह सन 1999 में उड़ीसा में आया सायक्लोन हो, कच्छ-भुज में आया भूकंप हो, 2008 में बिहार में आयी भयंकर बाढ़ हो या फिर पिछले साल आया उत्तराखंड का जल सैलाब हो, उनकी संस्था के स्वयंसेवकों द्वारा बढ-चढकर मदद करना एक अमिट छाप छोड़ने वाला रहा है । उडीसा में सायक्लोन से भारी तबाही मचने के बाद स्वयं बापू ने स्वयं ऐरिअल सर्वे कर ग्राउंड जीरो पर राहत कार्यों की अगुवाई की और संस्था ने अस्सी से ज्यादा रिलीफ कैम्प्स सबसे ज्यादा भारी तबाही वाले स्थानों पर लगाये । 1997 में जबलपुर भूकम्प के बाद पूरा गांव उनकी संस्था ने बसाकर दिया । ऐसा ही कुछ 2001 के भुज गुजरात में आये भूकंप के लिए बापू न केवल कई अनाथों को अपनाकर घर और अनाज समेत कई सुविधाएं मुहैय्या कराई बल्कि सैकड़ो घरों का निर्माण भी कराकर दिया । 2004 में समुद्रतटीय इलाकों को उजाड चुकी सुनामी के लिए गुजरात सरकार के साथ मिलकर टनों अनाज समेत कई ट्रकों में राहत सामग्री को रवाना किया । 2008 में जब गुरुकुल में बच्चों की मौत को लेकर चौतरफा हमलों की बौछार हो रही थी तब भी वे बिहार की कोसी आदि नदियों में आयी हुई भयानक बाढ़ ने बेघर हुए लोगों के लिए ध्यान केंद्रित किये हुए थे और तुरंत चार करोड रूपये की सहायता राशि उन्होंने समूचे प्रेस के सामने ऐलान कर सहायता के लिए अपनी टीमों को लगा दिया। पिछले साल भी उत्तराखंड में जल सैलाब के तांडव के दौरान भी उनका आश्रम मदद के लिए पीछे नहीं रहा । उदारमना बापू हमेशा से अपने कार्यकर्ताओं और अनुयायियों को शांतिप्रियता, सहनशीलता और नरमदिल व्यबहार करने की ही सीख देते आये हैं परन्तु मीडिया द्वारा उनके अनुयायियों को गुंडों सरीखे जैसा चित्रित करने का भरपूर प्रयास रहा है । पिछले समय में ऐसे मौके हुए हैं जिनमें अनुयायियों की रत्तीभर की गलती न होने के पर भी उन्हें हिंसा और तनाव उत्पन्न के लिए बेवजह जिम्मेदार ठहराया गया है । मीडिया रिपोर्टरों की ओछी फब्तियों से लेकर महिला अनुयायियों से की गयी छेड़छाडों से क्या-कुछ है जिसे बेचारे अनुयायियों नहीं पीया हो । ऐसे कई वाकये हैं जब बापू के अनुयायी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरें हैं तो उनकी भीड़ में असामाजिक तत्वों को घुसाकर भीड़ को हिंसात्मक प्रदर्शन का रूप दिया गया हो। पिछले वर्षों के दौरान बापू के अनुयायियों द्वारा जितने भी धरने-प्रदर्शन हुए है यदि उन सब को वास्तव में निष्पक्ष होकर देखा जाये तो स्थानीय पुलिस द्वारा की गयी बर्बरता ही निकल कर आयेगी । बापू के अनुयायियों के खून से सने माथे और घसीट-घसीट कर मारने के मंजर को तमाम मीडिया द्वारा बखूबी छुपाया गया है । दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर जोधपुर तक ऐसे कोई भी मौके नहीं है जब अनुयायियों के जमावड़े पर स्थानीय पुलिस प्रशासन ने दुत्कार की भावना दिखाते हुए, अतिरेक बल प्रदर्शन करते हुए लाठियां नहीं भांजी हो, अनुयायियों को गिरफ्तार कर टॉर्चर नहीं किया गया हो। बापू की गिरफ्तारी के दौरान शहर की शांति व्यवस्था बहाल करने के बहाने होटल और धर्मशालाओं से अनुयायिओं को ढूँढ- ढूँढकर निकालकर गिरफ्तार करने, रेलवे स्टेशन पर पहुँचते ही गिरफ्तार करने, स्वतंत्र-रूप से मौके और घटनाओं की फोटोग्राफी करने वाले अनुयायियों को बेवजह गिरफ्तार करने का जोधपुर पुलिस का ज्यादती रवैय्या बेहद शर्मनाक है । इससे भी पहले सन 2010 में गुजरात पुलिस द्वारा बापू की अनुपस्थिति में आश्रम में घुसकर वहाँ रहनेवाले कार्यकर्ताओं को बर्बर तरीके से घसीट-घसीट कर पीटने और धरपकड करने की कार्यवाही को जिसे तमाम मीडिया चैनल्स ने मजे ले-लेकर लाइव दिखाया गया, एक मानव-अधिकारों की अंतिम सीमा को लांघना करार दिया जा सकता है । बापू के अनुयायियों पर हुए इन पुलिसिया अत्याचारों के लिए बात-बात पर उठ खड़े होने वाले तमाम मानव-अधिकारवादी संगठनों और अधिकारिक संस्थाओं का यूँ चुप्पी साधे बैठना मानव अधिकारों के लिए कार्यरत होना महज एक ढकोसला ही सिद्ध होता है । ऐसे में सरकारी व्यवस्था का अनुयायिओं के प्रति दो-मुँही होना और इन ज्यादतियों पर लगायी गयीं शिकायतों पर कार्यवाही करने से कन्नी कट जाना, अनुयायिओं की सहिष्णुता और उदारवादिता को उनके विरोधियों के लिए अतिरक्षित लक्ष्य यानि सॉफ्ट-टारगेट बना हुआ छोड़ देना है ।

बापू पर लगे आरोपों के दरमियान एक अनजाना पक्ष जिसे हमेशा से बड़े स्तर पर मीडिया द्वारा दबाया गया, यह निकलकर आता है कि उनको सिलसिलेवार फँसाने की कोशिशें लंबे अरसे से होती रही हैं ।

बापू के लिए इस बुरे दौर में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बड़े-बड़े नेता जो उनके लाखों की भीड़ से ठसाठस भरे मंडपों का फायदा उठाते रहे हैं, उन पर बुरे वक्त की नजाकत भाँप या तो दूर हो लिए या फिर गिरगिट की तरह रंग बदल कर उनकी गिरफ्तारी के लिए सियासी गलियारों में शोर मचाते रहे, मीडियाई भोंपू के जरिये अपमानजनक शब्दों से अपने बडबोलेपन को जाहिर करते रहे । हाल ही के आम चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल करने वाली भाजपा बापू को समर्थन करने से भले ही बचती रही हो लेकिन पूर्व में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी आलानेताओं के बापू के भारतीय हिंदुत्व विचारधारा से देश को पुन: समृद्ध और विकसित बनाने के मुद्दों पर उनके साथ मंचासीन होने से इन चुनावों में मिले बड़े अनुयायी तबके के समर्थन को नकार नहीं सकती । ध्रुवीकरण की राजनीति और सामाजिक समरसता को विषैले करने वाले ज्वलंत मुद्दों की खिंचाई करने की कुव्वत कर बैठे बापू को राजनीति से प्रेरित होकर फाँसे जाने का अंदेशा पहले से हो गया था । फिर भी वे कांग्रेस समर्थित अप्रत्यक्ष एजेंडा के तहत उन जैसे हिंदू सन्तों के खिलाफ विदेशी बड़े धन के स्रोतों का इस्तेमाल होने के बारे में बेबाकी से पटाक्षेप करते रहे । जानकार मानते हैं कि उनका कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधीके खिलाफ सीधे-सीधे खरे बोल देना शायद महंगा पड़ा है और इसके लिए बदले की ताक में बैठी कांग्रेसी हाईकमान की स्वामीभक्त टीम ने इस बार बाबा पर लगे यौनशोषण के संगीन आरोपों के चलते केंद्र और राजस्थान में उनकी पार्टी की ही सरकार होने पर सोने पे सुहागे जैसे अवसर को देख उन्हें आखिरकार सलाखों के पीछे धर ही लिया। गौरतलब है कि बापू की गिरफ्तारी में कांग्रेसी केंद्र सरकार के गृहमंत्रालय की रुचि लेकर दखलअंदाजी बड़ी ही अप्रत्याशित रही थी ।

Distribution of free food grain to the poor population hit by natural calamities in Gujarat

बापू पर उठे विवादों के मद्देनजर उनके संतत्व के चोले को भी खूब प्रश्नचिन्हित किया गया है और टीवी चैनलों की बहसबाजियां हो या फिर प्रबुद्ध वर्ग के संपादकीय लेख, सभी में उनकी शिक्षाओं को दकियानूसी, आर्थोडोक्स और उनके प्रवचनों को अप्रासंगिक व ढोंगपंथी का दर्जा देकर उनके अनुयायिओं को सामान्य समाज से दो फाड करने की पुरजोर कोशिश भी की है । परन्तु नासमझ संपादक और बहसकर्ता इसका आंकलन करने में पूरी तरह से चूक गए कि संत तुकाराम के अभंग, वेदों-उपनिषदों की अधिकारिक ऋचाओं, मौला-जलालुद्दीन रोमी की रूहानी शायरी, संत कबीर के दोहे, संत तुलसीदास की चौपाइयों, मीरा के पदों, श्री सुखमनी साहिब के श्लोकों को बापू ने जिस लाजबाब तरीके से लोगों की मुंह-जबान पर रटाकर बुलंद किया है, इसका कदाचित ही कोई सानी हो । बापू भी अपने प्रवचनों में हमेशा से कहते रहे हैं -“मैं तो इन्हीं महान संतों की रचनाओं और कथाओं को ही आपको सुनाता हूँ, मेरे पास कोई मेरी विशेष रचनायें और उपासना पद्धतियाँ नहीं हैं । यह तो उन्हीं महान संतों की मेहनत का ज्ञान भण्डार है जिसको आप तक पहुंचाने की सेवा मैं किया करता हूँ ।“ साधु-संतों के प्रति भारतीय समाज में विकीर्ण होकर बैठी उपेक्षा की भावना का उन्मूलन कर उसे साधु-संतों के प्रति सम्मान और गर्व में परिवर्तन करने का काम बापू ने बखूबी किया है। ऐसे में एक लोकसंत की समाज में अहमियत को पोषण करने वाले बापू पर ‘आज लगे आरोपों से समूचे संत-समाज की बदनामी होना’, ठहराने वाली चंद स्वयम्भूओं की टीवी मंडली सिर्फ भर्त्सना की पात्र है। नए स्वतंत्र मत-पंथ की रचना की परिकल्पना को कोसों दूर रख बापू ने अपने प्रवचनों में बताये विचारों और उपासना की विविधताओं के बीच अपने श्रोताओं को उन्हें अपनाने और ना अपनाने की भरपूर स्वतंत्रता दी है । विगत कुंभ मेलों में लगने वाले डेरों में से उनके अलग ही विशेष संतश्री आसारामजी नगर में होने वाले प्रवचनों में उमड़ने वाली विशाल भीड़ एक तरफ और दूसरी तरफ बाकी के डेरों में आने वाली भीड़ का बौना होना बड़ा ही विस्मयकारी रहा है । ऐसा नहीं है कि उनके सत्संगों में उमड़ने वाली भारी भीड़ से होने वाला यह विस्मय पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों को पड़ताल के लिए ना खींच लाया हो । सन 1998 में गुजरात यूनिवर्सिटी द्वारा किये अध्ययन में बापू के प्रवचनों और शिक्षाओं को लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर मजबूत, जिम्मेदार और अनुशासित करने वाला हुआ है, वहीं ऐसा ही कुछ 2011 में आई.आई.टी. मुंबई के ह्युमैनेटीज विभाग द्वारा अनुसन्धान-पत्र में उन्हें एक लोक संत का दर्जा देने वाला साबित हुआ है । ‘संतत्व’ की खरी ऊचाईयों को छूने, अपने साधनाकाल में अहंकार को धूमिल करने के लिए डीसा की गलियों में उनका भिक्षाटन के लिए निकलना डीसा की उन कॉलोनियों के निवासियों के जेहन में आज भी ताजा है । माँ आनंदमयी, स्वामी श्री लीलाशाह जी, स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती, गीताप्रेस गोरखपुर के भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार, संत रामसुखदासजी महाराज, घाटवाले बाबा, श्री उड़िया बाबा, पूज्य हरिओम मोटा महाराज, पंडित श्रीराम आचार्य सरीखे संतों का सान्निध्य और स्नेह पा चुके बापू ने पूर्व के संतो की विरासत और थातियों को सहजने का कार्य भी किया है । उनके लुप्त हो चुके साहित्यों को संग्रहित कर पुन: प्रकाशित कर और उनके पुराने ट्रस्टों का अधिग्रहण कर सार-सँभाल करने वाले बापू ने सदा अपने प्रवचनों में क्षेत्रीय संतों की जीवनी और उनके योगदान को लोगों के सामने रखा है और कालांतर में जमीनों से सम्बंधित विवादों के उठने का एक कारण उन अधिग्रहित ट्रस्टों की अपरिभाषित परिधि का होना भी है । बापू के प्रवचनों और जीवनी पर प्रकाशन के इच्छुक रह चुका विश्व-प्रसिद्ध रोमां-रोलां ट्रस्ट भी बापू के विरासत संजोने के इस कार्य में उनके योगदान की प्रशंसा कर जुड़ने के लिए आग्रह कर चुका है । आज के समकालीन संतों के साथ भी बापू के सम्बन्ध परस्पर प्रतिस्पर्धा के बजाय सस्नेही ही रहे हैं और समय पर वे उनकी संस्थाओं के लिए मदद में अग्रणी भी रहे हैं । शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती पर हत्या के आरोपों के मामले पर बापू स्वयं आंदोलन की अगुवाई करते हुए सड़क पर आ बैठे थे । श्रीसत्य साईं के पर लगे आरोपों पर पुरजोर खंडन उन्होंने किया। स्वामी नित्यानंद की फर्जी सेक्स सीडी प्रकरण में जहां तमाम अध्यात्मिक धर्मगुरु मौन रहे वहीं बापू की संस्था द्वारा प्रकाशित पत्रिका ने इस विषय पर सच्चाई और साजिशों को बिना हिचकिचाहट के छापा । बाबा रामदेव के रामलीला मैदान के जन-आन्दोलन को कुचलने के खिलाफ वे जमकर बोले । परन्तु यह एक विडम्बना ही है कि आज उनके लिए इस मुसीबत की घडी में चुप्पी साधना या फिर नसीहत देना ही देखा गया है । विगत दशक में एक दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ल्ड पीस समिट ( विश्व शांति सम्मेलन) के लिए सूची में अग्रणी तौर पर बुलावा पाने वाले बापू ने सिंगापुर, हांगकांग, ताईवान, बैंकाक, इंडोनेशिया, पूर्वी अफ्रीका, केन्या, टोरंटों, सैन-फ्रांसिस्को, न्यू-जर्सी, शिकागो, टोक्यो, न्यूयोर्क, लन्दन आदि विभिन्न देशों के कई शहरों में भ्रमण कर भारतीय आध्यात्म की ताल ठोकी है लेकिन इन सबके बावजूद भी बापू ने अपने देश में पिछड़े से पिछड़े इलाकों, छोटे से छोटे गांव-ढाणियों के भ्रमण को ज्यादा तरजीह दी है और इसके लिए उनके विदेशों में कई केंद्र और आश्रम होने बाबजूद भी वे विगत कई सालों से देश के बाहर नहीं गए हैं । बापू के इसी सच्चे दिल से कीर्तन और प्रार्थना की रीत वाले अध्यात्म को सीधे-सरल आमजन, अनपढ़ की भाषा में समझ में आये ऐसा कर दिखलाने को तो अप्रासंगिक कतई नहीं कहा जा सकता । जहाँ आज एक ओर देश के कई प्रतिभावान खिलाडियों का कैरियर देश की खेल संस्थाओं में भ्रष्टाचार के चलते दम तोड़ देता है ऐसे ही हालातों में से निकलकर आये पुलेला गोपीचंद ने जब एक बड़े विराम के बाद किसी भारतीय ने ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैम्पियनशिप का ख़िताब जीतने का कारनामा कर दिखलाया तो इसके बाद कोल्डड्रिंक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सी के विज्ञापन के ऑफर को ठुकराकर जो उन्होंने आदर्शवादिता की जो मिसाल कायम की, उन गोपीचंद को अपने पास बुलाकर इस कदम की दाद देने वाले बापू ही पहले और अंतिम व्यक्ति थे। ऐसी दूरदर्शिता रखने वाले बापू को अप्रासंगिक नजरिये से तोला जाना एकदम अपरिपक्वता से भरा है । बापू ने अपने अध्यात्म-आन्दोलन को महज एक उपासना के सीमित पर्याय तक नहीं रख छोड़ा है तभी तो अग्रणी होकर कारगिल युद्ध की बजती रणभेरियों के बीच सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उनके बीच पहुँच जाना समेत उनके ऐसे कई कदम हैं जो अध्यात्म के साथ-साथ जुझारू कर्मठता के परिचायक हैं। यही नहीं, नासा के वैज्ञानिक से लेकर इजराइल के मशहूर फिजिशियन जैसे अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी बापू के पास योग और प्राणायाम के प्रयोगों का भरपूर लाभ उठाने आते रहे हैं । नेपाल जैसे देश में तो बापू को राजकीय अतिथि का दर्जा देकर वहाँ की सरकार उनका खूब आदर सत्कार भी किया है। नेता, अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्त्ता सभी उनके सत्संग आयोजनों में आते रहे हैं । इंजिनीरिंग से लेकर क्रिकेट तक, स्केटिंग चैम्पियन से लेकर डॉक्टरी के नए आयामों तक, गायिकी से लेकर कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो के मंचों पर अपना झंडा गाड चुके ऐसे अनेक युवा जो कहते रहे हैं कि बापू की शिक्षाओं और दिशा-निर्देशन से उन्होंने अपने जीवन को संवारा है, इस मुकाम तक पहुंचाया है तो उन पर अंधभक्ति का ठप्पा गढ़ने वाले शायद ये भूलते रहे हैं कि बापू से मिले अनुभवों से उनके जीवन जीने के नजरिये में भारी परिवर्तन हुआ है तो वे इसे अपने जीवन का सही पूँजी क्यूँ ना माने ?

बापू की इस अनंत यात्रा में एक समय ऐसा भी आया कि जहाँ हिंदू धर्मों के आलावा अन्य धर्मों के लोग भी उनके शब्दों के मुरीद हुए हैं । भोपाल के एक मौलवी उनकी एक पुस्तक 'महक मुसाफिर' पढ़कर इतना प्रभावित हुए कि उसे उर्दू में अनुवादित भी कर दिया । पेशे से सोशल जर्नलिस्ट रहे फारूख मोहम्मद कहते हैं – “मैं बापू पर लगे आरोपों से बड़ा दु:खी हूँ । कई मर्तबा मुझे बापू से रूबरू होने का मौका मिला है । वे सच्चे फ़कीर हैं और उन्हें मजहब की नजरों से नहीं तोला जा सकता । जिंदगी की जीने की जद्दोजहद जब मैं निराशा से सराबोर हो गया और बर्बाद करने वाली कई गन्दी आदतों फँस गया था तब वे बापू ही थे कि उनकी शिक्षाओं ने मुझे उबारा और आत्मविश्वास से लबरेज किया । यदि कोई पिछले दरमियान मीडिया में लगे आरोपों के बाद उन्हें सिर्फ कैमरे के फ्रेम से देखने की कोशिश करे, तो वाकई उनकी रूहानियत को न पहचान कर अपने से दूर करने जैसा है । उनकी तालीमों में उठाये जाने मसले मजहबों के बीच समता पैदा करने वाले और मुल्क के विकास के लिए कारगर हैं।” बात सही भी है कि बापू के प्रवचनों में साम्प्रदायिकता की बू तनिक भी नहीं आती है । सन 1992 में गुजरात में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री चिमनभाई पटेल की सरकार के दौरान डीसा में मजहबी उन्माद की वजह से तनाव की स्थिति बन गयी और धर्मांध भीड़ दंगों और आगजनी पर उतर आयी । धारा 144 लगाकर पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया । सभी जमावड़े और कार्यक्रमों को पुलिस रोक लगाकर बंद करने लगी । वहीं दूसरी ओर बापू के प्रवचन का शहर में तीसरा दिन था और भीड़ भी खूब जुटी हुई थी । ऐसे में शहर की परिस्थितिओं को काबू पाकर शांति बहाल करने की कोशिशों के बीच बापू के कार्यक्रम के लिए स्थानीय प्रशासन पूर्णतया निश्चिन्त था और कार्यक्रम को बिना रूकावट जारी रखने दिया । आखिरकार यह शासन का, बापू के प्रवचनों की विचारधारा पर वह अथाह भरोसा था जिसके बलबूते पर प्रशासन बापू द्वारा सन्देश प्रवचनों में शांति की गुहार करवाकर और इसका स्थानीय समाचार-पत्रों में प्रसारण कर शहर में शांति रखने में कारगर सिद्ध हुआ और बापू के श्रोताओं ने भी पुलिस का विश्वास जीत, शांति पूर्ण कार्यक्रम स्थल से शहर को दोबारा सूकून में लाने का बड़ी बखूबी सहयोग किया । ऐसे में उनके गुरुकुल में दो बच्चों की असामयिक मृत्यु पर समूचे अहमदाबाद शहर को कई दिनों तक आमजनों का आक्रोश दिखाकर हिंसा की आग में धकेला जाना और ऐसे ही इसके कुछ वर्ष पश्चात सोमनाथ और द्वारका में शहर के हालातों के बिगडने का हवाला देकर उनके सत्संग आयोजनों का रोका जाना उनकी शांति-प्रिय मुहिम को बगल में धकेल कर राजनैतिक रंग देना ही कहा जा सकता है ।

ऐसे में मीडिया चैनलों की टी.आर.पी. के लिए कभी खत्म न होने वाली भूख या फिर किसी के इशारों पर काम कर आज उनकी गिरफ़्तारी कराने में जिम्मेदार होने से कतई इंकार नहीं किया जा सकता ।

परदे के पीछे चल रहे ऐसे ही सियासी पैतरों ने आज उन्हें उलझाकर जेल की चारदीवारी के पीछे ला खड़ा कर दिया है । पिछले कुछ वर्षों में उन पर और उनकी संस्था पर जैसे मुकदमों के पहाड ही टूट पड़े हैं। जोधपुर, अहमदाबाद, सूरत, मुज्जरपुर समेत कई स्थानों पर मुकदमों के साथ साथ इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट और ह्यूमन राईट कमीशन जैसी संस्थाओं का एक साथ अचानक उठ खड़े होकर इन्वेस्टिगेशन खोल बैठ जाना कहीं न कहीं उन कारणों को इंगित करता है जो उनके खिलाफ बुने गए साजिश के पाश को दबाकर एकतरफा कार्यवाही करने की ठान बैठी हैं । उनके खिलाफ तमाम मुकदमे बुने हुए से लगते हैं जिन्हें मीडिया द्वारा परवान चढ़ाया गया । जैसे दामिनी बयान विवाद में मुज्जरपुर (बिहार) में सरकार के अनुशंसा के बिना ही गलत लीगल प्रकिया के तहत मुकदमा चलाना एक बद-इरादतन सा लगता है । वहीं डी के त्रिवेदी जाँच आयोग की रिपोर्ट अभी आना बाकी है लेकिन इसी आयोग के समक्ष एक गवाह की डिपोजीशन में धर्मान्तरण के लिए जाने वाली तथाकथित क्रिश्चियन मिशनरी का नाम आना भी कम चौकाने वाला नहीं है जो कि खुदबखुद एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करता है । दिल्ली से जोधपुर ट्रांसफर हुए नाबालिग से यौन शोषण की मामला जिसमें बापू की गिरफ़्तारी हुई, संदिग्धता से भरा हुआ है। इस मामले की रिपोर्ट लिखवाने वाली एक एनजीओ जिसका ताल्लुकात तमाम उन महिलावादी संगठनों से जो पिछले समय में बापू के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं । इन्वेस्टिगेशन एजेंसीज के अधिकारियों के ऑन कैमरा ऐसे बयान हैं जिनमें बापू पर बलात्कार के कोई चार्ज बनने से साफ तौर पर इनकार किया लेकिन अनजाना दबाब कहें या फिर और कुछ, चार्जशीट में पोक्सो जैसे जटिल एक्ट समेत बलात्कार की धाराएं उन पर मढ़ी गयी हैं । इस केस में एक लंबे समय से उनको जमानत न मिलना, सरकारी मेडिकल जाँच पैनल द्वारा मेडिकल रिपोर्टों में उनके स्वास्थ्य बदतर बताने के बावजूद भी स्वास्थ्य एवं भोजन सम्बन्धी सुविधाओं के लिए याचिकाओं को बार-बार ख़ारिज किये जाना तमाम ऐसे मुद्दे हैं जो राजनीतिक बदले की भावना को उजागर करते हैं। इससे भी आगे पोक्सो कानून की अनिवार्यता को बिना जांचे हुए इस कानून की जटिल धाराएं लगाकर विशेष कोर्ट में मुकदमा चलाने की हड़बड़ी दिखाना भी नियोजित सा ही लगता है । सवाल यह है कि जोधपुर पुलिस को शिकायतकर्ता लड़की के कुछ और अन्य ऐसे दस्तावेज जिसमें उसके बालिग होने की पुष्टि होती है, मिलने के बावजूद भी इन दस्तावेजों को क्यों चार्जशीट का हिस्सा बनाने से बचती रही है जो इस केस में पोक्सो की अनिवार्यता पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है । ऐसे ही अहमदाबाद में यौन आरोपों के मामले में उनकी पत्नी और बेटी को जमानत देने वाले न्यायधीश का एकाएक ट्रांसफर हो जाने में कहीं न कहीं इस मामले में सरासर राजनीतिक हस्तक्षेप दरकिनार करने लायक नहीं है ।

तो बहरहाल समय की टकटकी उस ओर लगी हुई है जब बापू बाहर आयें तो कुछ बात बने ।

Nishant Sharma
Writer-Activist, Contesting PIL at Supreme Court for Media Regulation and Fighting against Targeting Hindu Institutions.
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