भारी खर्च के बोझ तले दबा आपका अधिकार

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Rajasthan RTI rules in direct contradiction to RTI act

लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तम्भ न्यापालिका का पहले पारदर्शी होना जरूरी. दरकर है कई आमूलचूल परिवर्तन करने की -

2G घोटाले से लेकर कोयला घोटाले जैसे बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने में आर.टी.आई कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका रही है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मामलों पर कड़ा रुख रखते हुए लैंड मार्क जज्मेंट्स दिए हैं. लेकिन इन सब के बीच न्यायपालिका में भी मौजूद भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामले, भले ही दबे स्वर में, उठते रहे हैं. इसीलिए न्यायिक प्रक्रियाओं और इसके प्रशासन को पहले पारदर्शी होना न्यायपालिका की साख को और भी खरा बनाने के लिए जरूरी है. इसके लिए आर.टी.आई से सूचनाओं का सरल और कम खर्चे में उपलब्धिकरण, प्रक्रियाओं का डिजिटाईजेशन, न्यायधीशों और प्रशासनिक अधिकारीयों की संपत्ति के ब्यौरों का सार्वजनीकरण, Conflict of Interest के मामलों की जाँच अहम है.  हाल ही में न्यायालयों से जुडी आर.टी.आई प्रक्रियाओं और नियमों को चुनौती देते हुए दो याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट  में दायर हुई हैं. आइये एक नजर डालें व्यवस्था सुधार के प्रयास के लिए इस मुद्दे पर -  

क्या है मुद्दा ?

सूचना का अधिकार अधिनियम (2005) पारित होने के दस वर्ष बीत जाने के बावजूद क्या यह वास्तव में आमजन को सशक्त कर पाया है? इस सवाल का जबाब अभी आर.टी.आई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा, आर.टी.आई आवेदन की अपील के निस्तारण में लगने वाले समय और इसमें लगने वाले खर्च जैसे उभरते मुद्दों के हल के बाद ही संभव है. जहां एक ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने व्हिसल-ब्लोअर्स की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक ढांचा तैयार के करने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार की तरफ से व्हिसल-ब्लोअर्स एक्ट को शिथिल करने के प्रयास हैं. इन सब के बीच ‘राईट टू इन्फोर्मेशन’ को सशक्त करने की दिशा में एक और रुकावट इसके आर्थिक पक्ष को लेकर है. वैसे तो आर.टी.आई आवेदन की फीस मामूली है लेकिन यही फीस राजस्थान की अदालतों से जानकारी जुटाने के लिए हो तो खासा खर्चीला मामला है जो इसे सूचना का अधिकार अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत बनाती है.

हाईकोर्ट समेत तमाम अधीनस्थ अदालतों में आर.टी.आई आवेदन की फीस 100 रूपये और यदि मांगी गयी जानकारी किसी टेंडर, निविदा या व्यावसायिक अनुबंध से सम्बंधित हो तो 500 रूपये है जोकि राजस्थान व केंद्र सरकार के किसी भी विभाग और सुप्रीम कोर्ट से भी जानकारी प्राप्त करने के लिए देय फीस 10 रूपये की क्रमश: दस और पचास गुना है.

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अन्तगर्त  राजस्थान के हाइकोर्ट और इसके अधीनस्थ अदालतों से कोई भी जानकारी प्राप्त करनी हो या फिर कोई भी दस्तावेज, यह सब राजस्थान सूचना का अधिकार नियम (हाईकोर्ट व अधीनस्थ न्यायालय), 2006 के प्रावधानों के अनुसार होता है. लेकिन राज्य के सूचना के अधिकार इन नियमों में कई विसंगतियाँ और खामियां हैं. साथ आवेदन करने के लिए फीस भी कहीं अधिक है. इन कारणों से राजस्थान राज्य के ये नियम सूचना के अधिकार में निहित मूल उद्देश्य ‘सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी और सहज सुलभ तरीके से जानकारी प्राप्त करने’ के बिलकुल विपरीत ही साबित होते हैं.        

हाईकोर्ट समेत तमाम अधीनस्थ अदालतों से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी प्राप्त करने के लिए आवेदन करते समय 100 रूपये और यदि मांगी गयी जानकारी किसी टेंडर, निविदा या व्यावसायिक अनुबंध से सम्बंधित हो तो 500 रूपये की फीस देनी होती है जोकि राजस्थान व केंद्र सरकार के किसी भी विभाग और सुप्रीम कोर्ट से भी जानकारी प्राप्त करने के लिए देय फीस 10 रूपये की क्रमश: दस और पचास गुना है, वहन करने के हिसाब अव्यावहारिक है. राजस्थान में जहाँ प्रतिदिन की औसत प्रतिव्यक्ति आय 55 रुपये है और एक बड़ा तबका गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करता है, अभी भी भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा  और कई बुनियादी सुविधाओं से अछूता है वहाँ आमजन अपने हित की जानकारी जुटाने के लिए इस आर्थिक अड़चन के कारण हासिल ना कर पाएं, एक प्रकार से संवैधानिक मूल अधिकारों का हनन ही है और सूचना के अधिकार का मूल उद्देश्य प्राप्त कर में एक रूकावट है.     

क्या कहता है आर.टी.आई एक्ट फीस के बारे में ?    

वर्ष 2005 में पारित सूचना के अधिकार अधिनियम में हालांकि फीस की राशी कितनी होनी चाहिए, इससे संबन्धित कोई प्रावधान नहीं है लेकिन एक्ट सरकारों और सम्बद्ध अथॉरिटीज को जानकारी को मुहैय्या करने के लिए एक उचित राशी (Reasonable amount) के लिए आदेशित जरूर करता है. साथ ही अधिनियम में गरीबी रेखा से जीवनयापन करने वाले आवेदक से कोई भी फीस नहीं लेने का प्रावधान है. फिलहाल केंद्र और राज्य सरकार से सम्बद्ध अथॉरिटीज में आर.टी.आई एप्लीकेशन लगाने के लिए फीस 10 रूपये है. सुप्रीम कोर्ट जहाँ विषय जटिल भी होते हैं और निस्तारण में अधिक समय भी लगता है, में भी आवेदन के लिए यह राशि 10 रूपये है. ऐसे में राजस्थान सूचना के अधिकार 2006 के नियमों के तहत अदालतों से जानकारी मांगने के लिए आवेदन खर्च लगभग एक व्यक्ति की छह दिन की गाढ़ी कमाई के बराबर होना वास्तव में आर.टी.आई 2005 के प्रावधानों का उल्लंघन है. इसके आलावा नियमों में गरीबी रेखा से नीचे आने वाले आमजनों लिए मिलने वाली छूट का स्पष्टीकरण नहीं हैं.   

आर.टी.आई एक्ट 2005 के अनुसार जानकरी तीस दिन में ना मिलने पर पहली और दूसरी अपील नियुक्त अधिकारी को की जा सकती है जिसके लिए कोई भी फीस देय नहीं है लेकिन राज्य के सूचना का अधिकार 2006 के नियमों के अनुसार अतिरिक्त अपील के लिए अतिरिक्त 100 रुपये की फीस देनी होती है. इसके आलावा यदि कोर्ट के किसी रिकॉर्ड का निरीक्षण करना हो तो उसके लिए 100 रूपये की फीस अलग से देय है और वह भी दो घंटे तक रिकॉर्ड निरीक्षण के लिए. इस तरह अदालत से जानकारी प्राप्त करना भारी खर्चीला ‘अधिकार’ है तो है ही, साथ ही केंद्र द्वारा पारित 2005 के मूल एक्ट के उलट भी.

डिजिटाईजेशन के इस दौर में भी अदालत से जानकारी प्राप्त करना एक मुश्किल काम

जहाँ एक ओर सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के उद्देश्यों में राजकीय और संवैधानिक सभी संस्थाओं–विभागों के सामान्य कामकाजी का सूचनाओं एवं जानकारी का नियमित तौर पर प्रकाशन और उनका स्वत:सार्वजनीकरण करना निहित है और इसके चलते तमाम अथॉरिटीज सामान्य जानकारियों से लेकर प्रशासनिक खर्चों, महत्त्वपूर्ण निर्णयों-दस्तावेजों, दरख्वास्तों का स्टेटस से लेकर अधिकारिओं के संपत्ति के ब्यौरों आदि को इंटरनेट के माध्यम से जनसाधारण के लिए उपलब्ध कराने पर जोर दे रहीं हैं, वहीँ दूसरी ओर स्थानीय अदालतों के जज्मेंट्स और कार्यवाही से संबधित जानकारी ऑनलाइन जुटाने और मुहैय्या कराने का बुनियादी ढांचा अभी तक अधूरा है. बावजूद इसके कि राज्य के सूचना के अधिकार के नियमों में अर्जी आवेदन करने और फीस आदि का भुगतान करने का ऑनलाइन होना लिखा है जोकि पिछले दस वर्षों से अभी तक क्रियान्वित नहीं हुआ है, ना ही इसे लागू करने का कोई रोडमैप नजर आता है.  

फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट की याचिका पर निर्णय आ गया है, वहीँ राजस्थान में दायर याचिका पर कोर्ट की रजिस्ट्रार अथॉरिटी को जबाब दाखिल करने के निर्देश दिये गए हैं.

Dharm Raj
He is an advocate at Mumbai High-Court. Before this, An Entrepreneur and IIT alumnus in Naval Engineering.
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