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अपनी लेखनी से समाज का चेहरा दिखाने वाला लेखक, जो कहानियों से ज्यादा सच लिखा करता था, जो भाषा को प्रभावी तरीके से लिखने में कम और सच, सटीक और वास्तव में बोले जाने वाले लफ़्ज़ों को लिखने में विश्वास करता था, फिर चाहे वो कोई गाली ही क्यों न हो? अपनी बेबाकी के लिए कुल 6 बार जेल भी जा चुका ये लेखक कोई और नहीं सआदत हसन मंटो ही है. इनकी लेखनी जब भी चलती थी, समाज का सच्चा चेहरा ही सामने लाती थी, फिर चाहे वो कितना ही खूबसूरत हो या कितना ही घिनौना हो.

मंटो ने अपनी पहली कहानी ‘तमाशा’ जलियांवाला बाग की त्रासदी से प्रभावित होकर लिखी. ‘तमाशा’ एक 6 साल के बच्चे खालिद की कहानी है. कहानी में खालिद जलियांवाला कांड के दिन अपने अपने मां-बाप के साथ अमृतसर में होता है और मंजर से बचकर आ छूटे एक लड़के को यूं लूलुहान, असहाय सड़क पर पड़े देख अपने माँ-बाप से सवाल पूछने लगता है. 6 साल के बच्चे की प्रतिक्रिया दिल को छूने वाली है. इस कहानी में हिंसा उसके वातावरण में है और दिल को दहलाती है.

इनकी लेखनी के लिए कहा जाता रहा है कि ये अश्लील लिखा करते थे, पर इनके भावों को समझने वाले इनके मुरीद थे. इनकी कहानियां, इनके लिखे नाटक बहुत प्रचलित हुए, इनकी कहानियां आज भी उतनी ही प्रभावी है जितनी पहले थी. 11 मई 1912 को इनका जन्म पंजाब में हुआ था, समराला नमक जगाह पर. इन्होने अपनी अभिव्यक्ति की भाषा उर्दू को चुना. उर्दू में लिखते थे पर इनकी कहानियां हर बुराई पर चोट करती थी और इस चोट करने का तरीका और ये चोट लोगों को बहुत गहरी लगती थी. इनकी लेखनी के विरोधियों में कोई कमी नहीं थी. इनकी कहानियों में – टोबा टेक सिंह बहुत मशहूर हुई, ये कहानी भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय की है, जो अपने आप में बहुत गहरा प्रभाव है. इस व्यंग्यात्मक कहानी में लाहौर में स्थित पागलखाने में भी विभाजन को सोच कर लिखा गया है. इसमें हिन्दू भी है तो सिक्ख और मुसलमान भी. कहानी को सिर्फ विभाजन तक ही सिमित नहीं रखा गया. इस कहानी में बहुत गहरे से उस वक़्त की सियासत और सियासती जंग के बारे में भी ज़िक्र किया गया है और सबसे महत्वपूर्ण इन सब का असर बाकी लोगों पर क्या पड़ा वो भी.

इनकी मुख्य कहानियों में...  धुआं, ठंडा गोश्त, बू, टोबा टेक सिंह, गंजे फ़रिश्ते, बुर्के, रत्ती-माशा-तोला, शैतान, याज़िद. इन कहानियों से सामाजिक बुराइयों पर तो लिखा ही है, पर समाज का असली चेहरा भी सामने आया है. सबसे विवादित कहानीकार रहे मंटों कभी अपनी लेखनी को बेबाकी से बोलने से रोकते नहीं थे. इनके शब्दों को लेकर बहुत बवाल हुआ करता था, इन्होने वेश्याओं के बारे में भी लिखा है, इन्होने औरत और मर्द के रिश्तों को लिखा है, इन्होने हर उस चीज के बारे में लिखा है जो सामने देखा या महसूस किया है. मंटों का कहना है कि “कितने भी मुकदमों से इनको रोकने की कोशिश कर ले, मैं इन कहानियों को लिखना बंद नहीं करूंगा, मैं सच लिखना बंद नहीं करूँगा. अगर मेरे किस्सों कहानियों से इतनी ही तकलीफ है तो समाज बदल लो, मैं समाज लिखता हूँ, मैं सच लिखता हूँ, नमाज-पूजा पाठ करोगे तो वो लिखूंगा और वेश्याओं के यहाँ जाता कोई दिखेगा तो वो लिखूंगा. मैं अपनी आँखें बंद कर भी लूँ? पर अपने ज़मीर का क्या करूं?”

मात्र 42 साल की उम्र में 18 जनवरी 1955 को इन्होनें अपनी सांसे छोड़ दी. लेकिन पीछे छोड़ दी बहुत सारी कहानियां, बहुत सारे सवाल जो सैंकड़ों सालों तक इस समाज के चेहरे पर तमाचे मारते रहेंगे. जो समाज को जागने पर मजबूर करते रहेंगे. जो समाज का असल चेहरा समाज के ही सामने लाते रहेंगे.

 

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