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केरल की सत्ताधारी पार्टी सीपीआई(एम) के नेता और मुख्यमंत्री के सचिव कोडियारी बालकृष्णन ने बयान दिया हैं कि सेना किसी भी महिला का अपहरण और रेप कर सकती है. ये बात कहकर वामपंथियों अपना पॉलिटिकल सूसाइड लगभग तय कर लिया है. भारतीय सेना का मनोबल कमजोर करने के लिए या यूं कहें कि एक तरह से गाली देना शायद यह कम्युनिस्टों के अथक प्रयासों से में से ये एक हो सकता है लेकिन यह पहला वाकया नहीं जब कम्युनिस्टों ने सेना के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया हो. देश में लोकतान्त्रिक रूप से न्यून हुआ लेफ्ट इस दिनों सेना की मुखालिफत करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है.   

पिछले साल  जेएनयू की घटना तो याद ही होगी, जब कम्युनिस्टों के नए ब्रांड- एम्बेसेडर कन्हैया कुमार के नेतृत्व में कश्मीर की आजादी, भारत की बर्बादी और अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगाये गए थे. कन्हैया ने उन दिनों सेना पर जहर उगलते हुए बयान दिया था कि, कश्मीर में सुरक्षा बालों द्वारा महिलाओं का बलात्कार किया जाता है.

इससे पहले भी कम्युनिस्ट विचारधारा से भरे अर्बन नक्सलवाद के गढ़ जेएनयू में जनवरी 2015 को ‘इंटरनेशनल फूड फेस्टिवल’ के बहाने कश्मीर को अलग देश दिखाकर उसका अलग स्टाल लगाया था. साल 2010 में जब पूरा देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलवादियों की गोलियों से शहीद हुए 76 सीआरपीएफ  जवानों के शहादत में ग़मगीन था तब जेएनयू में जवानों की मौत का जश्न मनाया जा रहा था.

वर्ष 2000 में भी एक मुशायरे में कारगिल युद्ध के हीरो रहे सेना के दो अफ़सरों के साथ बदसलूकी करने की घटना भी सामने आई थी. इस मौके के लिये इनवाईट किये गए पाकिस्तानी शायर ने भारत का मज़ाक उड़ाते हुए कुछ शायरियाँ पेश की थी की जिसका सेना के उन अफ़सरों ने विरोध किया था.

माओत्से तुंग भारत का प्रधानमंत्री

कम्युनिस्ट पार्टियों ने 1962 में चीन के तानाशाह माओत्से तुंग  द्वारा भारत पर किए गए हमले का पुरजोर समर्थन किया था और कम्युनिस्टों दने चीनी सेना द्वारा भारत के करीब छह हजार सैनिकों की हत्या करने पर खुशियां भी मनाई थीं. इतना ही नहीं कम्युनिस्टों ने जवाहर लाल नेहरू  की जगह माओत्से तुंग को भारत का प्रधानमंत्री कहना शुरू कर दिया था.

नेताजी सुभाष बोस - तोजो का कुत्ता

कम्युनिस्ट हमेशा से परोक्ष और अपरोक्ष तरीके से अंग्रेजो के हिमायती रहे और स्वतंत्रता के आंदोलनों में अंग्रेजो की चाटुकारिता करते रहे.  दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हिदेकी तोजो  जब जापान के प्रधानमंत्री थे उस समय अँग्रेजो के विरुद्ध लड़ने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने जापान से सहायता ली थी. इस पर कम्युनिस्टों ने बोस को “तोजो का कुत्ता” और देशद्रोही करार कर उनके खिलाफ आंदोलन चलाया था. अपने जर्नल्स ‘पीपुल्स वार’ में टारगेट करते हुए कार्टून्स भी छापे.

फ़ासिस्ट सरदार पटेल

जनवरी 1948 में सीपीएम के संस्थापक नेता पुचालापल्ली सुंदरय्या ने एक बयान देते हुए सरदार पटेल पर आरोप लगाया कि उन्होंने भारत में फासीवादी शासन को कायम करने के लिए महात्मा गाँधी की हत्या की योजना बनाई थी.

मुस्लिम लीग का समर्थन

भारत की आजादी के समय कोम्युनिस्टो ने पाकिस्तानी मूवमेंट और मुस्लिम लीग का खुले दिल से समर्थन किया था. समर्थन की पुष्टि उस समय के कद्दावर कम्युनिस्ट नेता पूरण चंद जोशी करते हैं.

लेनिन वर्सेज गाँधी में गाँधी इज फेलियर

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया के संस्थापकों में शामिल रहे श्रीपद डांगे ने लेनिन वर्सेज गाँधी का परचा बाँटकर गाँधी जी को लेनिन की तुलना में एक असफल नेता बताने की कोशिश की थी. कम्युनिस्ट पार्टियाँ जो कभी-कभी अपने बचाव में गाँधीवाद की गोद में जा बैठती हैं और दूसरों को गोडसे का फोलोवर दशाने की जद्दोजहद में खून-पसीना एक कर देती हैं लेकिन अपनी इसी दो-मुहीं राजनीति से बाज नहीं आती हैं.

जेपी के ऊपर भी भद्दे कार्टून छापे

कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने गिरे हुए स्तर तक जाकर भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लाने वाले जय प्रकाशनारायण को भी अपना शिकार बनाया. अपने कार्टून्स में गाँधीजी को कंगारू माँ बताकर जेपी को कंगारू का बच्चा दिखाकर बचने के लिए छुपते हुए बताया.

     

रेड ‘महात्मा’ विद गन – कानू सान्याल

नक्सलबाड़ी हिंसक आन्दोलन के अगुवा रहे कानू सान्याल देश के व्यवस्था के खिलाफ रक्त रंजित क्रांति करना चाहते थे.

अरुंधती रॉय समेत लेफ्ट के तमाम नुमाईन्दे विगत वर्षों से देश-विदेशों के प्लेटफॉर्म्स पर इस बात का ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि आजाद होने से लेकर भारत ने अपने सूदूरवर्ती इलाकों नार्थ-ईस्ट, जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद सेना के बलबूते कब्ज़ा किया हुआ है और आर्मी एक्ट (APFSA) के जरिये इसे यथावत रखा हुआ है.

कम्युनिस्ट पार्टियां - अपने गिरेबां में झांक कर देखें !

सेना की कार्यवाही से जहाँ आम देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता हैं वही देश में ये तबका ऐसा हैं जो खुद को बहुत असहज महसूस करता है. ये वही लोग हैं जो राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं रखते, क्रांतिकारी और आतंकवादी में फर्क नहीं समझते, माओवादी, नक्सलवादी और जिहादियों के प्रति सहानभूति रखते हैं.  

नक्सलवादियों को आर्थिक एवं राजनैतिक सहायता के पैरोकार वामपंथी भूल जाते हैं कि उन्हीं की कॉमरेड सेना आये दिन बन्दूक की नोक पर महिलाओं को नक्सवादी बनने पर मजबूर करती है और इंकार करने पर सामूहिक बलात्कार किये जाते हैं. गत दिसंबर में बिहार के पश्चिमी चंपारण से एक एसी ही घटना सामने आई जब 30 वर्ष की एक महिला पर नक्सली बनने का दबाव बनाया गया और इंकार करने पर नक्सली महिला को घर से उठा कर सामूहिक दुष्कर्म को अंजाम दिया गया.

2011 में झारखण्ड के लोहरदगा से गिरफ्तार की गई महिला नक्सली कमांडर सुनीता उर्फ शांति ने नक्सल आंदोलन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि पुरुष नक्सली कमांडर महिला नक्सलियों का बंदूक की नोक पर यौन शोषण करते हैं और उन्हें नक्सली गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है. सुनीता ने बताया कि, “शायद ही कोई महिला स्वेच्छा से नक्सली बनती है. घाघरा गांव की रहने वाली पूनम कुमारी को भी यौन शोषण से बदहाल होने पर भागने का प्रयास करते समय उसने पुरुष कमांडरों के आदेश पर स्वयं को स्टेनगन से गोली मार दी थी जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई थी. पिछले दिनों इन्ही नक्सलियों ने झारखण्ड में पुलिस के जवानों को पानी पिलाने के जुर्म में आंगनबाड़ी सेविका के कान काट दिए थे.

हालिया उदाहरण भी लें तो कम्युनिस्ट पार्टियां के दिल्ली के निगम के चुनावों में भी दहाई की संख्या से आगे वोट हासिल ना कर पायीं. लोकतांत्रिक तरीके से कम्युनिस्ट पार्टियों की हैसियत अब ना के बराबर रह गयी है और अब देश इनके प्रपंचो को ज्यादा सहने वाला नहीं है.  

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