2490
Total
Engagement

यदि याद रही तो... हर साल हम पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती मना आगे निकल लेते हैं. लेकिन जिन राजनैतिक रहस्यमयी परिस्थितियों में उनकी मौत/ हत्या हुई इन पर बाकायदा आज भी पर्दा डाला हुआ है.

1965 की जंग में पाकिस्तान की उसी धरती पर रौंद देने वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का लोहा पूरी दुनिया जानती है. खैर, 1965 की लड़ाई खत्म हुई लेकिन चार महीने बाद सोवियत संघ के कहने पर भारत की माटी के सपूत लाल बहादुर शास्त्री जी पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से मुलाकात को राजी हुए. मुलाकात के लिए तत्कालीन सोवियत संघ का शहर ताशकंद जो अब उज्जेब्किस्तान में है, को चुना गया. शांति बहाली के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच लेकिन समझौते के अगले दिन देश के लिए एक बुरी खबर आयी कि हमारे प्यारे प्रधानमंत्री शास्त्री जी नहीं रहे. उनकी हार्ट-अटैक से मौत होना बताया गया. इस अनायास घटना पर पूरा देश स्तब्ध था और शक की सुई घूम उठी कि कहीं उनकी हत्या तो नहीं हुई?

उनकी मौत से जुड़े पहलू जिन पर आज भी राजनैतिक रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है -

उनके मौत की जाँच करने के लिए बिठाये गए राज नारायण कमीशन को कोई नतीजा नहीं निकला और कमीशन की जाँच से जुड़े दस्तावेज आज भी संसदीय लाईब्रेरी में उपलब्ध नहीं हैं मतलब को जाँच से जुड़े दस्तावेजों को दबाया गया या फिर नष्ट किया गया है

शास्त्री जी की पत्नी द्वारा बताया गया कि उनके शरीर नीला पड चुका था और कई कट-मार्क्स भी थे जबकि उनके पार्थिव शरीर का पोस्ट-मार्टम तक नहीं हुआ था

उनके साथ रहे डॉक्टर आर.एन.चुग कहा था, शास्त्री जी का स्वास्थ्य बिलकुल ठीक था और ना ही कभी उन्हें ह्रदय सम्बन्धी कोई समस्या कभी हुई थी.

शास्त्री जी की मौत की रात उनके साथ रहे डॉक्टर आर.एन.चुग और उनके सेवाकर्मी रामनाथ को 1977 में संसदीय कमिटी के सामने पूछताछ के लिए बुलाया जाना था लेकिन इससे ठीक पहले डॉ. आर.एन.चुग कमिटी के सामने आने के लिए निकले थे तो एक ट्रक द्वारा एक्सीडेंट में उनकी मौत हो गयी. ऐसा कुछ राम नाथ के साथ हुआ. राम नाथ जो पहले शास्त्री जी के परिवार से मिलने गए थे और बताया - “अम्मा, बहुत बोझ है, आज सब बता देंगे” लौटते वक्त एक कार ने उन्हें टक्कर मार दी जिससे उनकी दोनों टांगें ख़राब हो गयी और उनकी यदादश्त चली गयी. दोनों वाकये एक साजिश की तरफ इशारा करते है.

एक जर्नलिस्ट ग्रेगरी डगलस के मुताबिक - उन्हें एक सी.आई.ए. के एजेंट रोबर्ट क्रौउली ने इंटरव्यू के बताया कि शास्त्री जी और भारत में परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ होमी भाभा, दोनों की हत्या में अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सी.आई.ए. का हाथ है. इसका कारण शास्त्री की दूरगामी सामरिक सोच थी और उन्होंने डॉ होमी भाभा को भारत के लिए परमाणु कार्यक्रम और हथियार विकसित करने के लिए हरी झंडी दी थी. अमेरिका भारत को परमाणु संपन्न नहीं होने देना चाहता था.

ताशकंद प्रवास के दौरान एक रशियन बटलर शास्त्री जी के लिए सर्विंग कर रहा था. उसकी शास्त्री जी तक पहुँच आसान थी. उनसे गिरफ्तार भी किया था लेकिन उनसे बिना पूछताछ के यूं ही छोड़ दिया गया.

ये तमाम पहलू एक गहरी राजनैतिक साजिश की ओर इशारा करते है. शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री बताते हैं कि इस सिलसिले में जिस घटना की जाँच उच्चतम स्तर पर होनी चाहिए थी उसके लिए होम मिनिस्ट्री ने जाँच के आदेश दिल्ली पुलिस को दिए और घटना दस्तावेजों को जुटाने के नॅशनल आर्कईव्स को कहा तो सिर्फ आँखों में धूल झौंकने वाली बात हुई.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की फाइल्स को डि-क्लासीफाई करने के मुहिम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट और लेखक अनुज धर द्वारा दाखिल एक आरटीआई एप्लिकेशन के जबाब में प्रधानमंत्री कार्यालय से आये जबाब में ये कहा गया कि सरकार के पास इससे सम्बंधित एक ही दस्तावेज है जिसे डि-क्लासीफाई नहीं किया जा सकता क्यूँ कि उससे देश के विदेश सम्बन्ध ख़राब होने का खतरा है.

हालाँकि अनिल शास्त्री प्रधान मंत्री मोदी से शास्त्रीजी की मौत से सम्बंधित फाइलों को डि-क्लासीफाई करने के लिए पत्र लिखकर गुहार लगा चुके हैं. लेकिन अब वक्त है शास्त्री जी से मौत से सम्बंधित फाइलों का भी खुलासा हो.

Our Articles