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महान शायर फैज़ अहमद फैज़ साहब ने बहुत पहले एक नज्म लिखी थी

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है.

लेकिन शायद फैज़ साहब को आज का इल्म नहीं था. बोल कैसे सकता है कोई, कोई कैसे अपनी राय दे सकता है? सबकी आजादी की अपनी परिभाषा है. सबकी आजादी पर अपनी राय है.

एनडीटीवी के कर्ता-धर्ता प्रणव रॉय और उनकी पत्नी राधिका राय के ठिकानों पर जब सीबीआई का छापा पड़ा. उसके बाद प्रणव रॉय अपने पूरे लवाजमे के साथ प्रेस से मुखातिब हुए. अरुण शौरी, फाली नरीमन, कुलदीप नैय्यर, एच के दुआ, अरुण पुरी, ओम थानवी समेत तमाम दिग्गज समर्थन में जुटे. घोटाले पर जबाबों से हटकर सारा मुद्दा ‘फ्रीडम ऑफ़ प्रेस’ को कोसने पर आ गया. प्रधानमंत्री को लाइव इंटरव्यू के लिए चुनौती दे डाली. अरुण शौरी ने मोदी युग को ‘अधिनायकवाद की अवस्था’ कहकर भड़ास निकाल मन हल्का कर लिया.

लेकिन बात सीधी सी है अगर आप प्रेस का नाम ले कर कुछ भी करेंगे तो सही नहीं है? आप हो तो इसी देश के नागरिक ना? आप पर भी इसी देश के कानून लागू होते हैं? आप भी इसी सत्ता के साथ रहने वाले हैं? अब देश का कानून भी इनसे छोटा हो गया? चलो एक बार को ये सब बाते भी मान ली जाए जो कभी नहीं हो सकती, पर दिल पर पत्थर रख ही लिया जाये, तो ये जिस मुद्दे का मुखौटा लगा कर प्रणव रॉय जो कारनामे कर रहे हैं कम से कम उस पर तो बने रहे. सत्ता पर सवाल उठाने से पहले अपने सवालों को तो सही कर लो. खुद से भी सवाल पूछे जा सकते हैं उनके जवाब भी तैयार कर लो.

प्रणब रॉय लड़ रहे हैं. अभिव्यक्ति की आजादी वाला ढकोसला लेकर. खुद को बचाने के लिए जो किला तैयार किया था उसकी दीवार में इन्होने खुद ही सेंध मार ली है. प्रसिद्ध “द हिन्दू” की पूर्व संपादक और देश की वरिष्ठ पत्रकार ने मालिनी पार्थसारथी जब प्रणव रॉय साहब से सवाल करने शुरू किये तो उन्होंने उनको ट्विटर पर ब्लॉक कर के उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं छिनी? उन्होंने उनके अधिकारों का हनन नहीं किया? या उनके सवालों से आपको अपने विचार बदलते नज़र आ रहे थे. कुछ गलत तो नहीं बोली वो? उन्होंने सीधे-सीधे सवाल किये. दरअसल मालिनी पार्थसारथी ने अम्बानी साम्राज्य के घोटालों को उजागर करने वाले रामनाथ गोयनका के विश्वस्त न्यू इन्डियन एक्सप्रेस के स्तंभकार एस. गुरुमूर्ति के एनडीटीवी के घोटालों को उजागर करते हुए लिखे एक कॉलम पर अपने विचार रखे थे. उनसे बाद से एनडीटीवी स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की नुमाईन्दगी करने वालों ने एस. गुरुमूर्ति और मालिनी पार्थसारथी को ट्रोल करना शुरू कर दिया.

मालिनी पार्थसारथी ने लगातार किये गए अपने ट्वीट में अपने विचार बहुत ही साफगोई से रख दिए. उन्होंने कहा, “विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखने के लिए मीडिया घरानों को पारदर्शी रूप से सार्वजनिक जांच के लिए खुला होना चाहिए ठीक अन्य व्यवसायों की तरह. यही कारण है कि मुझे यकीन नहीं है कि एनडीटीवी का मामला वास्तव में प्रेस की आजादी का मामला ही है क्या? और अब एनडीटीवी को खुली जाँच की अनुमति दे देनी चाहिए. उन्हें प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे को ढाल बना कर व्यक्तिगत मुद्दे की अवधारणा को साबित नहीं करना चाहिए. पहले तो लगा कि ये महत्वपूर्ण है जिसमें लगा कि पत्रकारों की पवित्रता का बचाव किया जा रहा है पर फिर असल कहानी समझ आई. अभिव्यक्ति की अपनी नैसर्गिक स्वंतन्त्रता पर मैं भी बाकि मीडिया के साथ हूँ पर जो कर रहा है वो व्यक्तिगत फायदे लग रहे हैं. ये कितना सही है और कितना गलत है? ये संदेह दूर करने के लिए न्यायिक मार्ग एकमात्र सही तरीका है. लेकिन इतने पर ही लोग नहीं माने. उन्हें मोदी भक्त जैसे नामों से भी नवाजा जाने लगा जिसका जवाब उन्होंने साफ़ शब्दों में दे दिया कि ये दुर्भाग्य है आप और आपके एजेंडा के लिए, क्योंकि मैं न तो एक भक्त और न ही सरकार निकटवर्ती हूँ. मुझे अब पता चला है कि प्रणब रॉय ने मुझे ट्विटर पर ब्लॉक किया है विडम्बना ही है कि एक तरफ तो ये प्रेस फ्रीडम पर हमले का हवाला दे रहे हैं और दूसरी तरफ ये खुद उसी अवधारणा के शिकार हो रहे हैं? मैं एनडीटीवी के साथ सहमत नहीं हूँ इसका मतलब ये नहीं हैं कि मैं भगवा धारी यानी मोदी भक्त हो गयी हूँ. जैसे बीजेपी से असहमति मुझे कांग्रेसी भी नहीं साबित नहीं कर सकती. बस मैंने रिकॉर्ड के लिए एक स्क्रीन शॉट ले लिया है, कहीं कल को कोई अपनी बात से मुकर नहीं जाए. ब्लॉक करने का मतलब ये है कि आप वो आवाज दबा रहे हो जो अप सुनना नहीं चाहते हैं, और एक तरफ आप अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को दबाने के विरोध में खड़े हैं. ये दोनों बातें एक स्तर पर कैसे हो सकती है?”

उन्होंने अपने साफ़ स्टैंड लेकर एनडीटीवी के मामले पर सीबीआई के काम करने के तौर-तरीके पर कहा, “जब तमिलनाडु में राजनेताओं पर छापे पड रहे थे तब हम सब इसे सही मान रहे थे पर जब ये हमारे साथ हो रहा है तो ये दोहरे मापदंड क्यों?”

इन बातों को शायद एनडीटीवी और प्रणव रॉय झेल नहीं पाए, क्यूंकि बातें बनाना और करना बहुत आसान है. सच आजकल सभी के कानों में शीशे सा ही पिघलता नज़र आ रहा है. खैर,

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक, बोल जो कुछ कहने वाला कह ले.

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