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पीएम मटेरियल और जनता जनार्दन (कौनसी जनता? अरे वही, कांग्रेस एक सोच वाली) का लीडर बनने के लिए राहुल बाबा बड़ी मेहनत से कोर्स करने में लगे हुए हैं. इसी के चलते विपश्यना करने से लेकर अपनी सभाओं के फॉर्मेट बदल बदल कर एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं. अभी हाल ही में राहुल बाबा ने बयान दिया -

"आर-एस-एस और बीजेपी से लड़ने के लिए आजकल उपनिषद और भगवद्गीता पढ़ रहा हूँ" 

आगे इसी बयान में उन्होंने कहा -  

"गीताकुरान और आस्था की सभी चीज़ों का सम्मान करता हूँलेकिन देश संविधान से ही चलेगा"

पता चला है कि इसकी प्रेरणा उन्हें पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने दी है. लेकिन इसके पीछे की वजह कुछ और ही है. दरअसल संसद परिसर की दीवारों पर यहाँ तहाँ उकेरे गए, संविधान में अंकित और सरकारी सस्थानों के लोगोज में लिखे उपनिषदों के श्लोक परेशान किये हुए हैं. वे इनका अर्थ समझने का लोड नहीं ले पा रहे हैं. जैसे ही वे संसद भवन के गेट नंबर एक से एंट्री करते हैं तो उन्हें वहाँ देश की सम्प्रभुता के बारे में लिखा संस्कृत श्लोक दिख जाता है. जिसने उन्हें खासा परेशान किया हुआ है. 

लो३क द्वारपात्रार्नू  ३३  पश्येम त्वां वयं वेरा ३३३३ 
(हुं ३ आ) ३३ ज्या ३ ओ  ३ आ ३२१११ इति ।  

मतलब - देश के लोगों के लिए दरवाजा खोलें और देश की सम्प्रभुता सुनिश्चित करें. लेकिन राहुल बाबा ने सम्प्रभुता का कुछ और ही मतलब निकाला है और जेएनयू, रोहित वेमुला समेत कई मसलों में देश विरोध की ढफली पर ताल बजायी है.

यदि गेट नंबर एक से सेन्ट्रल हॉल की तरफ बढ़ते हैं, वहॉं गेट के ऊपर फिर एक पंचतंत्र का श्लोक लिखा हुआ है - 

अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।। 

इस श्लोक का मतलब है कि, “तेरा – मेरा वो लोग करते हैं जिनकी सोच संकीर्ण है, या जो छोटी सोच वाले लोग हैं, उदार चरित्र वाले लोग सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानते हैं.अब विश्व को परिवार स्वरुप मान लिया है शायद इसी दृष्टिकोण को मन में रख कर वो विदेशों की तरफ रुख कर लेते हैं.

वहीँ सेंट्रल हॉल के गुम्बद के नजदीक लिफ्ट नंबर एक की तरफ बढ़ते हैं तो वहाँ स्वर्ण अक्षरों में लिखा लिखा है - 

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा:, वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् । धर्मं सः न यत्र न सत्यमस्त, सत्यम् न तत् छलमभ्युपैति ।। महाभारत (5-35-58)

अर्थात्  वो सभा नहीं है जहाँ वृद्ध नहीं हो, वो वृद्ध नहीं है वो धर्म की बात नहीं कहते या जो धर्म को नहीं जानते, वो धर्म नहीं है जहाँ सत्य नहीं है और वो सत्य नहीं है जिस पर छल का लेप किया हुआ हो या जिस पर छल कपट का प्रभाव हो. वैसे तो संसद में चर्चासत्र के दौरान राहुल बाबा के इर्द-गिर्द ज्योतिरादित्य सिंधिया, गौरव गोगोई जैसे छरहरे लौंडे नजर आते हैं, जो उन्हें गुफ्तगू करके सलाह देते रहते हैं लेकिन राहुल गाँधी वहीँ हैं जो अपने वयोवृद्ध नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह के सम्मान में अध्यादेश फाड चुके हैं. 

ओहो हो.... घोर मनुवाद ! लिफ्ट नंबर दो की तरफ मनु स्मृति का श्लोक लिखा हुआ है - ​

सभा वा न प्रवेष्टव्या, वक्तव्यम् वा समञ्जसम्। अब्रुवन,विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्विषी ।। मनुस्मृति (8-13)

मतलब - भले ही कोई सभा में प्रवेश ही न करे; किन्तु जब प्रवेश करे, तो ठीक तरह से धर्म एवम् न्यायसंगत वचन ही बोलने चाहिए. जो सदस्य या तो सभा में बोलेगा ही नहीं,और बोलेगा तो झूठ बोलेगा, वह पाप का भागी होगा.

फिर लिफ्ट नंबर तीन -  दया मैत्री च भूतेषु दानम् च मधुरा च वाक् । न हि दृशम् सं वननं त्रिशुलोकेषु विद्यते ।।(महाभारत , विदुर नीति )

मतलब - प्राणि मात्र के लिए दया ,मैत्री ,दान देने की प्रवृत्ति और मधुर संभाषण का स्वभाव यह चारो गुण एक साथ होना त्रिलोक में दुर्लभ है.यहाँ हम समझ सकते हैं कि 'खून की दलाली' जैसे शब्द उनके मधुर सम्भाषण के ही प्रतीक हैं. राहुल बाबा दानी तो हैं ही सो सबकुछ बेचकर फटा कुर्ता जो पहनते हैं और सूट-बूट की सरकार को गरियाते हैं.

इसी तरह लिफ्ट नंबर चार की तरफ शुक्रनीति का श्लोक, लोकसभा स्पीकर आसन के पीछे 'धर्मचक्रप्रवर्तनाय', राज्यसभा के एक ओर एंट्री गेट की दीवार पर महाभारत के वन पर्व (207-74) की सूक्ति 'अहिंसा परमो धर्मः' और दूसरे गेट पर  भगवतगीता का (18-45) श्लोक 'स्वे -स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिः लभते नरः' उकेरा हुआ है. राहुल बाबा जहाँ भी अपनी नजर फोकस, ज़ूम और पैन करें वहीँ उन्हें गीता-उपनिषद के श्लोक दिमाग में तैरने लग जाते हैं.

संविधान को पढ़ने के लिए उन्होंने पन्ना उलटा तो भी उन्हें वहाँ प्रीएम्बल के पेज पर राममनोहर सिन्हा द्वारा जो चित्रकारी की है, उनके सिग्नेचर पर "राम" ही  छपा हुआ दिखता है. संविधान का, भारत सरकार के शासन का आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते” के बारे में राहुल बाबा से इतनी उम्मीद तो लगाई जा सकती है कि वो इसका मतलब तो जानते होंगे और ये कहाँ से लिया गया है इसकी जानकारी तो होगी ही. चलो बता ही देना बेहतर है कि ये पंक्ति मुण्डक-उपनिषद से लिया गया है. 

संविधान-संसद ही नही भारतीय संस्थानों में भी उपनिषद-गीता के श्लोकों को ध्येय वाक्य बनाया है. फिर चाहे वो भारतीय सेना हो या किसी राज्य की मुख्य पंक्ति हो. मुंबई पुलिस हो या दूरदर्शन या आल इंडिया रेडियो हो. सुप्रीम कोर्ट भी इसी की पालन करता है, “यतो धर्मस्ततो जयः” जहाँ धर्म है वहां विजय है. अर्थात धर्म की ही विजय होती है. अब राहुल बाबा विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के ध्येय वाक्यों की इस फेरहिस्त पर गौर फरमायें -

•    Life Insurance Corporation of India - 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' - "I shall take care of welfare" (taken from the Bhagavad Gita)
•    Indian Navy- 'शं नो वरुणः'-  "May Varuna be peaceful to us"
•    Indian Air Force - 'नभःस्पृशं दीप्तम्' - "Touching the Sky with Glory" (from Bhagavad Gita: XI, Verse 24)
•    Maharashtra Police - 'सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय' - "For protection of the good and control of the wicked"
•    Indian Coast Guard - 'वयं रक्षामः' - "We protect"
•    All India Radio - 'बहुजनहिताय बहुजन‍सुखाय‌' - "For the benefit of all, for the comfort of all"
•    Rajputana Rifles - 'वीरभोग्या वसुन्धरा' - "The earth is fit to be ruled by the brave"
•    India Meteorological Department: 'आदित्यात् जायते वृष्टिः'- "The Sun Gives Rainfall"
•    Doordarshan: 'सत्‍यं शिवम सुंदरम' -"Truth is God and God is beautiful"
•    Intelligence Bureau: 'जागृतं अहर्निशं' -"Wide awake day and night"
•    Research and Analysis Wing: 'धर्मो रक्षति रक्षित:' - "Dharma Protects those who protect the Dharma"
•    Defense Research and Development Organisation - बलस्य मूलं विज्ञानम् : - "Knowledge is strength"

अरे ये क्या सारा का सारा माहौल कम्युनल हो रखा है. चीजों का भगवाकरण हो गया है. ये सब संघ की दुकानें हैं. 

कुल मिलाकर राहुल बाबा गीता-उपनिषदों का अध्ययन कर रहे हैं, खोज कर ये ही मिला संविधान और संस्थाओं में हर जगह उपनिषद घुसे हुए हैं, और देश इसी संघी संविधान से चलेगा.

अरे वाह क्या लॉजिक है? अब वे ही बता सकते हैं कि सैंतालीस की उमर तक वे क्या पढ़ रहे थे? धर्म शास्त्र तो नहीं पढ़े. धर्म पढ़ने का उद्देश्य सही नहीं है. अगर वो धर्म को दुर्भावना से नहीं स्वेच्छा से ही पढ़ते तो शायद ज्यादा भला हो जाता.  

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