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खबर कुछ पुरानी जरूर है लेकिन काम की है. पीटीआई के हवाले का पुष्टि टैग भी है.

पिछले दिनों अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की उर्दू एकेडमी के डायरेक्टर और उर्दू लेखक राहत अबरार ने अपनी किताब “सर सैय्यद और उनके मा’सरीन’ यानि कि ‘सर सैय्यद और उनके कन्टेम्पेररी’ को लौंच करने के दरम्यान एक बात कही, जो वाकई बड़ी वजनी है खास उनके लिए जो बीफबैन की आग में पशुक्रूरता पर उतारूं हैं. दरअसल उन्होंने बताया कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक और मुस्लिम प्रोग्रेसिव शिक्षाविद सर सैय्यद अहमद खान साफतौर पर गाय के बूचड़ पर पाबन्दी के बड़े हिमायती थे. उनका मानना था, “हिन्दू समाज के साथ दोस्ताना सम्बन्ध बरक़रार रखने के लिए गौकशी पर पाबन्दी जरूरी है”. एक लेख में सर सैय्यद ने लिखा. “यदि गौकशी पर पाबन्दी देश में हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच यदि शांति और भाईचारा ला सकती है तो ये मुस्लिमों एक बड़ी गलती होगी यदि वे इसे नहीं छोड़ते हैं तो.” 

सर सैय्यद अहमद खान

राहत अबरार बताते हैं. बात आजादी से पहले के दिनों की है जब यूनिवर्सिटी को ऐंग्लो-मोहमडन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था. उन दिनों मुस्लिमों ने ईद पर गौ-कशी का खुमार छाया हुआ था. यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में कुछ छात्र गाय काटने के लिए खरीद के लेकर आये. जैसे सर सैय्यद को जब बात का पता लगा तो बेहद अपसेट हो गए और तुरंत हॉस्टल भागे. गाय को अपने पास रखा लिया और गौकशी को रोका. इतना ही नहीं पूरे कैंपस में भविष्य में परिसर में ऐसा नहीं करने का आदेश भी दे कर आये. अबरार ने बताया कि शुरुआत से ही यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में बीफ नहीं परोसा जाता है. मांसाहार में भैंस का मीट ही दिया जाता है.

अलीगढ आन्दोलन पर तीन किताबें लिख चुके राहत अबरार ने अपनी इस किताब में तत्कालीन हिन्दू नेताओं से सर सैय्यद के दोस्ताना संबंधों और साथ किये कार्यों की चर्चा की है, जिनमें प्रमुखतः आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राम मोहन राय, लाला लाजपत राय, बनारस के राजा शिव प्रसाद, राजा शम्भू नारायण, सर सुरेन्द्र बनर्जी और भारतेंदु हरिश्चंद्र शामिल थे. सर सैय्यद ने हमेशा भारतीयता का पाठ ही पढ़ाया और हिन्दू भावनाओं को सम्मान देते रहे थे. उन्होंने एकता और अमन पर ही सन्देश दिया था.

राहत अबरार ने लाला लाजपत राय के एक पत्र का हवाला देते हुए कहा कि लाला लाजपत राय के पिता सर सैय्यद को उन्नीसवीं सदी का पैगम्बर मानते थे. सर सैय्यद ने 12 जून 1897 को प्रकाशित अपने अलीगढ इंस्टिट्यूट के गजट में बरेली की उन मुसलमानों के प्रयासों की भूरि प्रशंसा की जिन्होंने अपनी स्वेच्छा से ईद पर गौकशी को छोड़ने का फैंसला लेकर हिन्दूओं की भावनाओं का सम्मान किया. इस बाबत सर सैय्यद की खूब आलोचना भी हुई लेकिन उन्होंने अडिग रहते हुए भी हिन्दुओं के साथ दोस्ताना संबंधों की वकालत करना नहीं छोड़ा.      

खैर मुद्दा कैसा भी हो, सियासत अपने पैर उसमें फंसा ही लेती है. इस बार जो हुआ वो शायद किसी को गवारा नहीं था. पार्टियाँ वोटों की राजनीति के लिए अपने स्तर को इस तरह गिरावट तक ले आएँगी कि अब आगे का क्या सोचना?    

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