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एक तरफ  जहाँ जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितो का रहना मुश्किल होने के कारण उन्हें अपनी ही संपत्ति वहाँ छोड़नी पड़ी थी और अपनी ही भूमि प्राप्त करने को सघर्षरत हैं दूसरी तरफ वहां की सरकार द्वारा विदेशी रोहिंग्या समुदाय के लोगो को शरण देना और उन्हें राशन, पानी और बिजली आदि मुलभुत सुविधाएं प्रदान करना वह की सरकार के रवैये को संशय प्रकट करता हैं ।

रोहिंग्या समुदाय मूलतः म्यांमार के रखाइन राज्य के मुस्लिम निवासी है इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं । सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है. हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं । म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर 9 पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बाद रखाइन राज्य में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया था । म्यांमार सरकार के कुछ अधिकारियों का दावा है कि ये हमला रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने किया था । इसके बाद सुरक्षाबलों ने मौंगडोव ज़िला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और एक व्यापक ऑपरेशन शुरू किया । इस कारण ये समुदाय वहाँ से विस्थापित हो गया ।

फ़िलहाल रोहिंग्या समुदाय कुछ लोग जम्मू, नगरोटा, साम्बा, लेह और कारगिल जिलो में पड़ाव डालें हुए  है और हाल ही में नगरोटा अटैक होना जो की स्थानीय सहायता के बिना असंभव था में इन विदेशी शरणार्थियों की भूमिका होने से इंकार नहीं किया जा सकता है । लेकिन बांग्लादेश को पार कर जम्मू कश्मीर पहुंचना भी आशंका पैदा करता है और यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी है । ऐसे में जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा रोहिंग्या शरणार्थियों की सहायता करना संदेहास्पद हैं ।

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