अपनी स्वछंद सनक की स्लेव हैं श्रीमोई जैसी महिलावादी

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Sita’s curse writer Sreemoyee feels proud to call heras Erotica Queen

श्रीमोई जैसी सभी कथित महिलावादियों का हिन्दूधर्म में नारी की स्थिति को ‘सेक्स स्लेव’ रूप में वर्णन करना और इसके लिए धर्म और बाबाओं को कारण बताकर आँख मूँद कर वकालत करना, केवल उस ओछी स्वछंदता भरी “माय बॉडी माय चॉइस” वाली कुंठा की झलक है, जिसेवे समस्त समाज पर थोपना चाहती हैं. स्त्री और पुरुष के बीच भरोसे वाले संबंधों में सदा स्त्री को निम्न तरजीह दिखाना चाहती हैं.

सीताज कर्स की लेखिका श्रीमोई पियु कुंडू का हाल ही लेख “महिलाएं किसी बाबा के लिए 'सेक्स स्लेव' क्यों बना दी जाती हैं?” उनकी वैचारिक दरिद्रता और शोध के अधूरेपन को ही दर्शाता है. अपने उल-जलूल परिकल्पित प्रश्नों से सने श्रीमोई ने अपने लेख में लिखा है कि सदियों से हिन्दू धर्म ने महिलाओं को आस्था और रीति रिवाजों की बंदिशें और रोकटोक से भयाक्रांत कर उनके यौनशोषण के लिए पृष्ठभूमि का निर्माण किया है और इसके चलते हिन्दू धर्मगुरुओं और पुरोहितों ने महिलाओं को अपनी यौन-इच्छापूर्ति के लिए आसान शिकार बनाया है. लेखिका ने भारतीय महिला की इस मनोदशा के लिए उसके परिवार और सहकर्मी महिला सदस्यों को भी सीधे तौर पर पर सहायक बताया है. ऐसे में श्रीमोई ने हाल ही में उठे विभिन्न धर्मगुरुओं के विवादों की दुहाई देते हुए अपने इसआंकलन का सामान्यीकरण किया है और इस आंकलन में संत आसाराम बापू के विषय में मूल पहलुओं को परे रखते हुए अपनी सहूलियत से कांट-छांट कर मुद्दे को विशेष रंग देने की जेहमत की है.

श्रीमोई तो उस असीमित स्वछंदता की पैरवी करना चाहती हैं जहां लड़कियों को खुले आम अंतरंगता स्थापित करने की बेहिसाब आज़ादी मिले और उनके परिवारों में ऐसी विचारधारा का संवर्धन हो. इसीलिए वे शायद ये भूल जाती हैं कि एक लड़की का उसके उज्ज्वल भविष्य का शुभचिंतक पिता इसलिए पढने के लिए बाहर शहर नहीं भेजता कि ड्रिंक्स, क्लब और मौजपरस्ती के आलम में अपने करियर निर्माण के लक्ष्य से भटक उसकी बमुश्किल कमाई गयी पूँजी को स्वाहा करे.

श्रीमोई का यह कहना कि भारतीय परिवारों में स्त्री प्राय: शादी का न होना, बच्चे न होना, पैसे की तंगी, कलह या फिर पति के साथ को सेक्स समस्या आदि की दोषी ठहरा दी जातीं हैं और इन समस्याओं के लिए उसे धार्मिक कारणों का हवाला देकर पश्चताप के एक सूनेपन में जीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है जिसके चलते वह अपनी सेक्स डिजायर की अपने पसंद के अनुसार जाहिर नहीं कर पाती हैं और उस सेक्स डिजायर को धार्मिक पुरोधाओं को वासनापूर्ति के लिए न्यौछावर करनी पड़ती है.

श्रीमोई का ऐसा निष्कर्ष सिर्फ एक नाटकीयता से भरा नजर आता है और कुछेक घटनाओं के दायरे से निकला हुआ है जोकि उनकी किताब सीताज कर्स की काल्पिनिक पटकथा में भी झलकता है. उनका यह चित्रण भारतीय हिन्दू परिवारों में महिलाओं की खुशहाल स्थिति (जोकि आमतौर पर परिलक्षित है) मुख्य कैनवास से कहीं न कहीं भटका हुआ है. हिन्दू परिवारों में लड़कियों की स्वंतत्रता की स्थिति खुशहाल है. लडकियां अपने माँ-बाप के भरोसे को कायम रखकर जीना पसंद करती हैं और उसके माँ-बाप उसकी हर आजादी और इच्छा को तवज्जो देते हैं जहां तक उसके असुरक्षित होने का सवाल नहीं है. ऐसे कई हिन्दू परिवार उसके माँ-बाप और पति उसे काबिल बनाने के लिए या फिर उसका हाथ बटाने में संगी-साथी बन दिन-रात एक हुए हैं. हिन्दू परिवारों में शादी के बाद उसका स्वागत एक गृह-लक्ष्मी के रूप में किया जाता है. हर सास उसे अपनी उत्तराधिकारी, ननद उसे अपनी सखी और श्वसुर उसे बेटी सामान ही देखता है. हिन्दू परिवारों में आज भी ज्यादातर लड़कियां अपने जीवन साथी का चुनाव करने में अपने माँ-पिता पर ही भरोसा जताती हैं और ऐसे हुए निर्णयों में संतुष्ट भी हैं. इसके विपरीत श्रीमोई कोई ऐसा दृष्टान्त भी रखतीं जहाँ उन्मुक्त होकर किसी महिला न अपने जीवन साथी का चुनाव किया और पारिवारिक और सेक्स समस्याओं से बची हो और अपने दाम्पत्य जीवन को सतत रख सकीं हों ? नहीं ना...शायद इसीलिए श्रीमोई उस पक्ष को नजर अंदाज कर गयी. इसीलिए हिन्दू परिवारों में ऐसा माहौल तो कतई नहीं है जो परिवार की समस्याओं के लिए पछतावे की मनोदशा एक स्त्री को जीने के लिए उद्यत करे और उसके दिमाग के अन्दर यह बैठाये कि उसकी समस्याओं का निवारण तरीका धार्मिक है और इनमें बदलाव धार्मिक संस्था और गुरु पर अपनी निष्ठा (लेखिका के अनुसार सेक्स डिजायर) न्यौछावर करके ही होगा. ना ही हिन्दू धार्मिक संस्थाएं किसी वेश्यालयों की प्रतिभूति संरचनाएं हैं और ना ही हिन्दू धर्मगुरु महिलाओं की समस्याओं में फंसे होने को स्थिति को अपनी यौनवासनापूर्ति का रास्ता तलाशते हैं या फिर निष्ठा का फायदा उठाने के लिए लक्षित है जिसे लेखिका ने संत आसाराम बापू पर यौनशोषण लगे आरोपों चलते उनके प्रति बने एक विपरीत नजरिये से ग्रसित होकर एक सम्पुट दिया है. संत आसाराम बापू के प्रवचनों के एक आधे हिस्से को गलत सन्दर्भ में रखकर आधार बनाया है. वैज्ञानिकता से प्रमाणित हुई यही बात कि सेक्स ऊर्जा का सिर्फ प्लेजर के दुरूपयोग हानिकारक है यदि झेन फिलोसोफी से कहा दिया जाता तो लेखिका के लिए बात तर्कपूर्ण और प्रासंगिक हो जाती. संत आसाराम बापू की तालीम के जरिये गायकी से लेकर ऐथलेटिक्स या फिर आर्मी में ऊँची रैंक से लेकर डॉक्टरी तक के मुकामों का हासिल करने महिला अनुयायीयों के एक पक्ष को श्रीमोई यदि अपने लेख में कैप्चर करने की कोशिश करती तो पता चलता कि वे बाबा के लिए सेक्स स्लेव तो कतई नहीं है और नहीं उन्होंने कोई अपनी ‘निष्ठा’ दांव पर लगायी है. यह तो केवल कोरी कल्पना है. दुर्भाग्य से बापू आज यौनशोषण के आरोपों चलते जेल में है तो इसके कारण अन्यत्र हैं जिन्हें शायद ही लेखिका शोधित कर पाए लेकिन ये जरूर जाने लें कि समाज से तिरस्कृत कई ऐसी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होकर स्वाभिमान से जीना सिखाया है इसी बाबा ने.

इसलिए श्रीमोई तो उस असीमित स्वछंदता की पैरवी करना चाहती हैं जहां लड़कियों को खुले आम अंतरंगता स्थापित करने की बेहिसाब आज़ादी मिले और उनके परिवारों में ऐसी विचारधारा का संवर्धन हो. इसीलिए वे शायद ये भूल जाती हैं कि एक लड़की का उसके उज्ज्वल भविष्य का शुभचिंतक पिता इसलिए पढने के लिए बाहर शहर नहीं भेजता कि ड्रिंक्स, क्लब और मौजपरस्ती के आलम में अपने करियर निर्माण के लक्ष्य से भटक उसकी बमुश्किल कमाई गयी पूँजी को स्वाहा करे.

श्रीमोई ने दक्षिण भारतीय मंदिरों में उन्मूलित हो चुकी देविदासी परंपरा के हवाले से हिन्दू धर्म को स्त्रीशोषक और वेश्यावृत्ति –पोषक ठहराने की कोशिश भी की है जिसे महिला आयोग द्वारा वेश्यावृत्ति के जारी भ्रामक आंकड़े से सही साबित करने की कोशिश की है. पहली बात तो देविदासी परंपरा क्या देविदासी परंपरा समूचे हिन्दू वर्गों में प्रचलित है ? नहीं. यह परंपरा सिर्फ दक्षिण भारतीय शासकों के काल में प्रचलित हुई. दूसरी बात देविदासी का पर्याय समाज में प्रतिष्ठापूर्ण जीवनके लिए रखा गया था जोकि कालांतर में ब्रिटिशकाल में पतन की ओर अग्रसर हुआ जब मंदिरों से शासकों का मालिकाना अधिकार समाप्त हो गया. जिसके चलते देवदासियों को आर्थिक स्त्रोतों का अभाव हो गया. परिणामस्वरुप यह एक प्रोस्टिटूशनके व्यवसाय की तरफ मुड़ गया. लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हर देवदासी एक सेक्स-वर्कर हो और हर सेक्स-वर्कर को देवदासी नहीं कहा जा सकता. किसी भी समाज में वेश्यावृत्ति के लिए आर्थिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार होते हैं. हिन्दू धर्म भी अन्य धर्मों की तरह इससे अछूता नहीं है. काश श्रीमोई चर्च में फल-फूल रहे प्रोस्टिटूशन जो ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ अ नन’ किताब के आने पर उजागर हुआ, उसका एक आयाम अपने इस लेख में दे पातीं !

ऐसा आज ही नहीं यदि वैदिक काल से भी इतिहास को समेट लिया जाये तो भी ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं, जहां स्त्री को समाज निर्माण के लिए शक्ति केंद्र माना है और उसे वैचारिक वरीयता में सर्वोपरि रखा है. शास्त्र-लेखन से लेकर शस्त्र-चालन तक की विधाओं में भारतीय स्त्रीयों का उस काल में होना क्या हिन्दू धर्म में स्त्री-शोषण का परिचायक है ? कन्या पूजन की विधा भी इसी हिन्दू धर्म में है जिसके बारे में लिखने से श्रीमोई की कलम चूक जाती है.

शोभा डे, कविता कृष्णन, श्रीमोई जैसी इन कथित महिलावादियों का हमेशा का दुखड़ा रोना है कि इन्होने भारत में जन्म ही क्यूँ लिया ? भारतीय महिलाओं को अपने हिसाब से चार पतियाँ रखने की इजाजत नहीं हैं ? महिलाओं को खुले लिव इन रिलेशन बनाने की आज़ादी नहीं हैं? पोर्नबैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. ‘किस ऑफ़ लव’ देश की सरकार द्वारा अनुमोदित हो. इन्हें राधे माँ एक सेक्स अपील लगती है और सनी लियोन एक यूथ आइकॉन लगती है.

खोखले निष्कर्ष को समेट हुए अपनी किताबों को मार्केटिंग के बलबूते बेस्ट सेलर का तमगा पाने के इस चलन ने ऐसे लेखकों को कुकुरमुत्ते की तरह पनपा दिया है जो अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत स्वार्थ साधने के लिए आये दिने अपने कुतर्कों के सहारे हिन्दू धर्म को निशाने पर लेते हैं और भावनाओं को उकसाने के लिए टीका करते हैं. ऐसे लेखकों के विचारों और सिद्धांतों की मनगढ़न्तता और दोहरापन स्वत: सिद्ध हो जाती है यदि एक बार इनकी पृष्ठभूमि को खंगाल लिया जाये तो.

इसलिए मैं कहती हूँ कि श्रीमोई का शोध अधूरा है .....दोबारा मेहनत करें. पुन: प्रकशित करें.

Nivedita Vajpayee
She is an avid observer of social issues. Professionally she is a chemical scientist.
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