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ये इंडियन क्रिकेट का सबसे बुरा दौर था - सचिन तेंदुलकर. ये लाइन सुनी होगी इस मूवी में.

क्रिकेट का इतिहास बहुत विविध है, इसकी विविधता का प्रमाण अब बड़े परदे भी दे रहे हैं, पहले अज़हरुद्दीन, फिर धोनी, अब क्रिकेट के भगवान कहे माने जाने वाले महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की फिल्म परदे पर आ चुकी है. इस भगवान् को देखने लगभग सारे भक्त कतार में नज़र भी आ रहे हैं. सभी जानते हैं कि सचिन की फैन फोलोइंग कम नहीं है. उनके सारे रिकार्ड्स के साथ साथ ये भी एक रिकॉर्ड ही है कि उनके प्रशंशक बहुत है. उनको बुरा कहने वाले शायद ढूंढने से भी ना मिले. सचिन क्रिकेट जगत का वो सितारा है जो हमेशा अपनी चमक बढ़ता ही गया. पाक-साफ़ नियत का खेल और खेल ऐसा की विरोधी भी वाह वाह कर दे.

पर क्या क्रिकेट “इतिहास” हमेशा इतना ही चमकदार रहा है? क्या इस खेल के दामन पर कोई दाग कभी लगा नहीं? क्या इस खेल को सच में हमेशा इसी खेल भावना से ही और ईमानदारी से खेला गया है? मैं बात कर रहा हूँ क्रिकेट के उस काले दौर की. जब इस धर्म पर से लोगों का विश्वास उठने लगा था. जब इस धर्म के सभी देवता बुरे लगने लगने थे. सीधी भाषा में कही जाए तो बात कर रहा हूँ मैच फिक्सिंग के उस दौर कि जब वास्तव में लोगों का विश्वास उठ गया था क्रिकेट से. ये सच में वो तूफ़ान था जिसमें बहुत से खिलाड़ियों की नैय्या ऐसी डूबी की आज तक पार नहीं लगी. इस दौर ने बहुत से नामचीन खिलाड़ियों का कैरियर ख़त्म कर दिया.

आज इस इतिहास के पन्नों की ओर नज़र डाली जाए तो उनमें वो काले पन्ने भी नज़र आयेंगे जो इस खेल को शर्मशार कर देते हैं. इन्हीं पन्नों पर भारतीय क्रिकेट ही नहीं पूरे विश्व भर के क्रिकेट प्रशंसकों को ना सिर्फ निराश किया बल्कि विरोध करने पर भी मजबूर कर दिया था.

क्या मनोज प्रभाकर ये सब पब्लिसिटी के लिए कर रहे थे ?

दरअसल साल 1997 में टीम के आलराउंडर मनोज प्रभाकर ने आउटलुक मैगजीन को बयान देकर एक सनसनीखेज दावा किया कि 1991 के शारजाह में भारत-पाकिस्तान के मुकाबले में कम लाईट होने के बावजूद मैच जारी रखने के कहा गया था. भारत ये मैच हार गया था. इसी तरह 1994 में सिंगर कप में भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान प्रभाकर को ख़राब खेलने के 25 लाख की पेशकश की गयी थी. ये आरोप प्रभाकर ने बिना नाम बताये अपनी टीम के एक साथी पर लगाये थे. इन गंभीर आरोपों ने कपिल देव, अजित वाडेकर, अशोक मांकड़ , सचिन तेंदुलकर, दिलीप वेंगसरकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन, मांजरेकर, गावस्कर, नयन मोंगिया, अजय जडेजा जैसे दिग्गजों समेत कई स्पोर्ट एडिटर्स, टीम मैनेजर सभी को जाँच के दायरे में ला दिया। जबाब में, बीसीसीआई ने रिटायर्ड चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया - यशवंत चंद्रचूड की अध्यक्षता में जाँच कमीशन बैठा दिया। कमीशन ने जाँच की और बीसीसीआई ने रिपोर्ट को दबा लिया.

क्रोन्ये ने तो वॉर्मकैन ही खोल डाला 

7 अप्रैल वर्ष 2000. दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये पर भारत के खिलाफ एक दिवसीय मैच फिक्सिंग का आरोप लगा. दिल्ली पुलिस को हैंसी क्रोन्ये की सट्टेबाज संजय चावला से बातचीत की टेप हाथ लगी जिसमें खिलाडियों और बुकीज़ के बीच में पैसों का लेनदेन की बात साफतौर पर निकल कर आ रही थी. इस बड़े खुलासे ने   क्रिकेट जगत की अच्छी छवि वाले लोगों को कटघरे में ला खड़ा कर दिया. हैंसी ने उसके बाद एक बड़े भारतीय खिलाड़ी का नाम लिया जिससे भारत में सभी को चौंका दिया. नाम था तत्कालीन भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन का. मौके का फायदा देख मनोज प्रभाकर फिर मैदान में आ कूदे.

प्रभाकर ने तहलका के ऑफिस जाकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपने और साथी खिलाडियों से हुई एक कोवर्ट बातचीत के टेप को पब्लिक में उजागर कर दिया. प्रभाकर ने आरोप लगाए कि मैच फिक्सिंग भारतीय ड्रेसिंग रूम के लिए कोई नयी बात नहीं है. उन्होंने सीधे तौर पर कपिल देव को मैच फिक्सिंग का जिम्मेवार ठहराया. प्रभाकर ने दावा किया सचिन इस बात के जानकार के थे और संजय मांजरेकर को इन सभी गलत कामों के बारे में मालूम था.मांजरेकर ने सीधे तौर पर इन आरोपों से इंकार कर दिया. सचिन चुप रहे और अपने कमर्शियल एंडोर्समेंट के कार्यक्रमों में ही व्यस्त रहे. प्रभाकर एक के बाद एक बड़े नामों को टारगेट कर रहे थे. इसी बीच बीसीसीआई ने चंद्रचूड़ कमीशन की रिपोर्ट को पब्लिक कर दिया और प्रभाकर के पिछले सालों से लगाए जा रहे आरोपों की पोल खोल दी. रिपोर्ट में प्रभाकर के आरोपों को झूठा बताया गया था. इधर दिल्ली पुलिस अजरुद्दीन और अजय जडेजा समेत कई खिलाड़यों को जाँच कर रही थी और सट्टेबाजों की धरपकड़ कर रही थी. एक के बाद एक कड़ियाँ खुलती रही और वो जंजीरें भारतीय खिलाडियों के करियर पर कसती गयीं. 20 जुलाई 2000 को आयकर विभाग ने अजय जडेजा, अज़हर, नयन मोंगिया और निखिल चोपड़ा के घर पर छापा मारा. कपिल देव भी इससे अछूते नहीं रहे. 31 अक्तूबर 2000 के दिन अज़हर ने इस गुनाह में शामिल होने की बात कबूल ली. अज़हर ने साथ साथ नयन और अजय की बात भी कह डाली. आरोपों के उलट मनोज प्रभाकर खुद अपने जाल में फँस गए  27 नवम्बर को बीसीसीआई ने अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर, अजय शर्मा, अली इरानी को भी दोषी साबित कर दिया. पर इसमें कपिल देव और नयन मोंगिया पर से आरोप हट गए.

कपिल देव टीवी पर क्यूँ रोये ?

इसका असर भारतीय फैन्स पर इतना गहरा पड़ा के लोग सड़कों पर आ गये. खिलाडियों के पुतले जलाए गए. उनके घरों के सामने खूब प्रदर्शन हुआ, पूरा देश इस क्रिकेट त्रासदी से गुज़र रहा था. क्रिकेट से लोगों का विश्वास उठता नज़र आ रहा था. कुछ लोगों की गलती ने सारे क्रिकेट जगत पर इतना प्रभाव किया कि सबको भुगतना पड़ा. कपिल देव ने करण थापर को बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि, “जिस खेल को खेलने के लिए पूरी ज़िन्दगी लगा दी उसके बदले मुझे ये झेलना पड़ा,कोई देश से गद्दारी कैसे कर सकता है? मेरा घर से निकलना मुश्किल हो गया था, मेरी बीवी मेरी बेटी सबका जीना मुश्किल में पड़ गया था. गद्दार करार देने से पहले पूरी जांच की जाती तो शायद मैं जो की निर्दोष था इन चीजों से बच सकता था. किसी की गलती का नतीजा मुझे भी उतना ही भुगतना पड़ा. मुझ पर ये इल्जाम लगाया गया वो भी बिना जांच पड़ताल किये हुए.” कपिल देव ने ये बयान रोते हुए दिए थे. वो नेशनल चैनल पर फूट फूट कर रोने लग गए थे.

ऐसे बयान सिर्फ कपिल देव के ही नहीं बाकि भी सभी खिलाडियों के आये थे. पर दोषी तो दोषी रहे. इनके अलावा और भी बहुत सारे विदेशी खिलाडियों के नाम इसमें शामिल हुए, और बहुत से दोषी भी पाए गए जिन पर आजीवन और बहुवर्षीय खेलने पर प्रतिबन्ध लगाया गया. सचिन, सुनील गावस्कर, अजय जडेजा, नैन मोंगिया, अज़हर, कपिल देव, जगमोहन डालमिया आदि का नाम भी शामिल हुआ पर जो सही थे वो साफ़ बाहर निकल गए. जो दोषी थे वो रहे. 6 साल के बाद अज़हर ने अदालत से राहत पा ली.

रवि शास्त्री, काम्बली, नवजोत सिंह सिद्धू, मनोज प्रभाकर, सौरव गांगुली आदि के इंटरव्यू भी आये. मौहोल इतना खराब हो गया था कि खिलाड़ियों के व्यक्तिगत जीवन भी दुश्वार हो गया था. सचिन के हाथ कप्तानी लगी. पर उनसे कप्तानी भी छिनी गयी, ये बोल कर के कप्तानी के दबाव का प्रभाव उनके खेल पर पड़ रहा है, जिससे वो ठीक से खेल नहीं पा रहे थे. ये सारा प्रभाव और ये बदलाव इसी फिक्सिंग की वजह से हो रहा था. सारे साफ़ छवि वाले खिलाड़ी बहुत परेशान थे. उतना ही जनता का दबाव और जनता की परेशानी और उनका गुस्सा सड़कों पर दिखने लगा था.

इतना ही नहीं काले पन्ने और भी हैं, जब भी अब कोई मैच किसी वजह से हारा जाता उसे फिक्सिंग का टैग ही भुगतना पड़ता. इसके आलावा मैच हारना, वर्ल्ड कप से बाहर होना, या किसी भी खिलाड़ी पर आरोप लगना आम हो गया था. इसी के चलते एक बार धोनी के घर पर पथराव भी हुआ था क्योंकि वो वर्ल्ड कप में टीम को आगे नहीं ले जा पाए.

इसी कटी हुई नाक को भी बचाने और भारतीय क्रिकेट जगत पर से इस कलंक को तो कभी नहीं मिटाया जा सका. पर इसकी छवि सुधारने में भी एक बहुत लम्बा अरसा लगाना पड़ा. हालत आज बहुत सुधार में है पर पूरी तरह सट्टेबाजी से क्रिकेट बाहर है, ये कहना आसान नहीं है और कहा भी जाए तो इसे कोई माने ये जरुरी नहीं है. जहाँ तक लगता है इस बात से सभी इनकार ही करेंगे.

सचिन पर बनी फिल्म में सही तौर पर पहली बार इस बात का ज़िक्र किया गया था. इस पर आधारित फिल्म्स तो और भी बनी है पर सीधी तौर पर ये मुद्दा निशाना नहीं बनी. सचिन की इस फिल्म में चींजें सीधी सामने आई है. हालाँकि बहुत थोड़े में इस किस्से को खत्म कर दिया गया पर इस पर थोडा फोकस करने की कोशिश की गयी. अज़हर पर बनी फिल्म पर में अज़हर को हीरो बनाने के चक्कर में बहुत सारे तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया गया है या उन्हें दिखाया ही नहीं गया है.

सच ही है छवि बनाने में समय नहीं लगता और बिगड़ने में चन्द पलों का खेल है. खेल तो बिगड़ा है पर दर्शक इसी उम्मींद के साथ कि भ्रष्टाचार का ये खेल बंद हो जाएगा, फिर सजदा करने में जुट हुए हैं.

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